संदेश

Yu jaise..... kal hi ki baat ho…

कितना वक़्त हुआ... तुमसे मिले हुए.. मुद्दत सी.. लगती हैं.. फिर भी.. जेहन में ताज़ी हैं... यूँ जैसे... कल ही की बात हो... नहीं... तेरी मखमली उंगलियाँ हैं जैसे... अब तक मेरे इन हाथो में... किस तरह हौसला देते हुएं.. मेरी हथेलियों पर.. तेरी उंगलियों की पकड़ मजबूत हो जाया करती थी... तेरी नजर अभी भी मेरे चेहरे पर ही.. कही ठहरी हुई हैं... यही वजह हैं जो अब तक रोशन हूँ मैं.. जहाँ मिलते थे कभी हम... वहां जाता हूँ ...तो तुम अक्सर मिल जाती हो.. मुझे छेडती...मुझसे अठखेलियाँ करती हुई.. देखता ही रह जाता हूँ शुन्य में अपलक... जब कभी कहता हूँ "ठीक हूँ मैं " किसी के पूछने पर... तुम जैसे कही से कह पड़ती हो.. "सच बताओ " जब टहलता हूँ यूहीं जब राहो में.. तुम बहुत दूर तक साथ चलती हो मेरे... और फिर वो चले भी जाना मेरे फैसले पर तेरा आंसुओ को मुझसे छुपाते हुए और मेरा कह पड़ना. "कि भूल जाना मुझे क्यूकी मैं तुम्हे हरगिज़ याद ना रखूँगा " उफ़... सच.. यकीं नहीं होता... कितना वक़्त हुआ तुमसे मिले हुए... मुद्दत सी बीती लगती हैं... मगर फिर भी... जेहन में ताज़ा हैं तू इस तरह... यूँ लगता ...

पल बना रहा.. बात.... चलती रही..

चंद पलों का साथ था चंद पलों की बात थी... जिंदगी गुजर गयी...... पल बना रहा.. बात.... चलती रही...

सफ़र-ऐ-जिंदगी

क्या हासिल हैं मेरी इस जिंदगी का... सोचता हूँ.. तो खालीपन ही पाता हूँ टूटती साँसे.. डूबती नब्ज़.. बिखरी रूह.. ख़त्म होती कहानी का हिस्सा बना जाता हूँ . दूर हो मेरे माझी.. मेरे दोस्त.. मेरे यार से... एक गुमनाम जिंदगी मैं जिए जाता हूँ... इतनी तनहा हो रही हैं ये जिंदगी बसर.. अपना साया भी जो देखू.. सिहर जाता हूँ.. कोई हैं या नहीं इस जहाँ मेरी खातिर.. जवाब देते इस सवाल का मैं घबराता हूँ... नाकाम न हो जाऊ रिश्तो की कसौटी पर... सोच नए रिश्ते बनाते मैं कतराता हूँ.. खुद पर भी नहीं यकीं अब मुझको... खुद से भी अब तो.. मैं, नजरे चुराता हूँ... कोई इख्तियार नहीं रहा अपनी हस्ती पर... कुछ चाहता हूँ... और कुछ.. मैं कह जाता हूँ मेरी तन्हाई का न उड़े मखौल इस महफ़िल... झूठे अपने यारो का मैं दम भरे जाता हूँ.. दुनिया से टकराऊं .. कहाँ कूबत बाकी.. खुद से चिढ़ता हूँ . खुद पर ही झल्लाता हूँ... दौर गुजरा हैं उल्फत का यूँ भी मुझ पर.. नाम-ऐ-मोहब्बत लेते मैं काँप जाता हूँ... किसी शय की तमन्ना यूँ तो नहीं मुझे... फिर भी उसे दूर जाता देख सहम जाता हूँ जिंदगी मेरी यार अब ये अजीब पहेली हैं.. हर रोज इसके पेच में कुछ ...

नहीं आती कहनी रूमानी बातें...

मुझे कहाँ आती हैं कहनी... ख्वाबो की सुहानी बातें मुझ से तो रूठी रहती हैं सारी ही पुरानी बातें.. मुझमें कहा हैं हुनर कह पाऊं जुबानी बातें मुझे.. तो सिर्फ उल्फत हैं... नहीं आती कहनी रूमानी बातें... ...आलोक मेहता...

क्या हुआ जो हर शय तुझसे लड़ने पे है आमादा

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यूँ रो-रोकर ना अपने जख्मो की नुमाइश कर... खुद ही संभल जा... किसी से मदद की न फरमाइश कर क्या हुआ जो हर शय तुझसे लड़ने पे है आमादा अब जो मिला हैं मौका तो अपने भी जोर की आजमाइश कर... ..आलोक मेहता... yu ro rokar na apne jakhmo ki numaish kar... khud hi sambhal jaa kisi se madad ki na farmaish kar... kya hua jo har shay tujhse ladne pe hai aamaada... ab mil hai mauka, to jara apne bhi jor ki aajmaish kar... aalok mehta... (from my old collection)

फिर वही हैं तन्हाईयाँ.. फिर ये मन उदास है..

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{Image courtesy :- voiceinrecovery.wordpress.com) ख्वाब देखता हूँ मैं.. कि, वो फिर मेरे यूँ पास हैं .. खिल गया मेरा ये मन, उम्मीदों को मिली परवाज़ हैं पर आंख खुली जो मेरी.. फिर वही एहसास हैं... फिर वही हैं तन्हाईयाँ.. फिर ये मन उदास है.. Khwab dekhta hun main.. ki, wo phir mere yun paas hain. khil gaya mera ye man.. ummeedo ko mili parwaaz hain.. par aankh khuli jo meri.. phir wahi ehsaas hain.. phir wahi hain tanhaiyan.. phir ye man udaas hain... ..aalok mehta... (from my old collection)

चाँद फिर अब ये... थोडा सीला सा लगता हैं...

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(Image Courtesy : Layoutsparks.com) कुम्हलाया थोड़ा .... कुछ पीला सा लगता हैं हिल गया जगह से.. जरा ढीला सा लगता हैं... रात भर रोई हैं फिर से आंखे किसी की... चाँद फिर अब ये... थोडा सीला सा लगता हैं... ...आलोक मेहता... kumhalaya thoda, kuch peela sa lagta hain.. hil gaya jagah se, jara dheela sa lagta hain.. raat bhar barsi hain phir se aankhein kisi ki... chaand phr ab ye.... thoda seela sa lagta hain... ...aalok mehta..