उसकी 'तू' मेरी 'मैं' से बड़ी क्यूकर हो

इस तरह हवा-ऐ-तल्ख़ का जोर हुआ हैं
बस्ती-ऐ-शायर भी रंज का शोर हुआ हैं

रकीब से दुश्मनी रख क्या पाऊंगा मैं
यार से ही जब नाता कमजोर हुआ हैं

उसकी 'तू' मेरी 'मैं' से बड़ी क्यूकर हो
झूठी शान का तमाशा पुरजोर हुआ हैं

बादल की हैं गलती न सूरज ही खतावार
चाँद का आज दुश्मन... खुद चकोर हुआ हैं

रूबरू आते हैं वो.. तो झुक जाती हैं निगाहे
उनकी क्या कहे, खुद दिल ही चोर हुआ हैं

साथ जो थे "आलोक",,, थी अदब-ओ-तहजीब की जंजीरे
अब दूर जो ठहरे.. हर शिकवा खालिस मुहजोर हुआ हैं


...आलोक मेहता...

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