कि ये खता... मेरी न थी...

तेरी निगाहों का था तकाजाकि ये खता... मेरी न थी...इजहार-ऐ-इश्क जो यूँ हुआ..हरगिज़ रज़ा... मेरी न थी...मगर अब जो ये हुआ...क्या इल्तजा.. तेरी न थी..तेरे भी हिस्से थी तनहाइयाँ.ये फकत सजा... मेरी न थी...आलोक मेहता...
तेरी निगाहों का था तकाजाकि ये खता... मेरी न थी...इजहार-ऐ-इश्क जो यूँ हुआ..हरगिज़ रज़ा... मेरी न थी...मगर अब जो ये हुआ...क्या इल्तजा.. तेरी न थी..तेरे भी हिस्से थी तनहाइयाँ.ये फकत सजा... मेरी न थी...आलोक मेहता...
बहुत सुन्दर और संवेदनशील रचना
जवाब देंहटाएंबहुत ही खुबसूरत पंक्तिया...
जवाब देंहटाएं@ Sanjay Bhaskar ji...
जवाब देंहटाएंबेहद शुक्रिया संजय भास्कर जी...
@ sushma 'आहुति' ji...
जवाब देंहटाएंआभार स्वीकार करे सुषमा जी...