मैं ही बदल जाऊँगा... अमां क्या कहती हो ... नए रंग ढल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो..... खुद से मिलते तो.. बनता नहीं कभी... उससे मिलने कल जाऊंगा... अमां क्या कहती हो... उसकी थी आरजू.. जूनून भी था? क्या कभी? बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो... शाम का चूल्हा जलाता हैं यूँ भी हर रोज मुझे... धूप से मैं जल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो... कई बरस गुजरे.. मेरा सावन यूँ ही पुरजोर हैं.... इस रिमझिम से गल जाऊंगा..अमां क्या कहती हो... गोया एक तनहा ही तो नहीं मैं रंज-ओ-ग़म का मारा.... फिर मैं ही ऐसे मर जाऊंगा... अमां क्या कहती हो... आलोक मेहता...
बहुत सुन्दर और संवेदनशील रचना
जवाब देंहटाएंबहुत ही खुबसूरत पंक्तिया...
जवाब देंहटाएं@ Sanjay Bhaskar ji...
जवाब देंहटाएंबेहद शुक्रिया संजय भास्कर जी...
@ sushma 'आहुति' ji...
जवाब देंहटाएंआभार स्वीकार करे सुषमा जी...