शिखर पर हो या निचला ही पायदान हो कोई कितना ही

मैं भी कह सकता था औरो सा, की मुझे इल्म नहीं
मुझ पर हुआ हैं जो वो, उससे बड़ा कोई सितम नहीं
कि मेरा नहीं कोई कसूर सब किस्मत का किया हैं
हार चाहे हुई मेरी, मगर मैं खतावार हरदम नहीं

मगर किस सूरत ऐसा यारो बोलो मैं यह झूठ कह देता
आईने में जो शख्स हैं भला उसे कैसे ये जिरह देता
कि दुनिया को नहीं मैंने खुद को जो समझाना था
अपनी ही रूह को धोखा मैं यारो किस तरह देता

इतने इम्तिहानो के बात फकत एक बात मैं जानी हैं
हार हो.... या जीत मेरी हस्ती तो न बदल जानी हैं
"आलोक" हर हाल, यार.... शख्स वही रहना हैं
गर हार में बेहतर नहीं, सूरत जीत में भी वही रह जानी हैं

इन फिजूल फलसफो पर अब तो ये जिंदगी न चलेगी
कोशिश तो भरपूर होगी मगर नतीजे से हस्ती न बदलेगी
शिखर पर हो या निचला ही पायदान हो कोई कितना ही
गर शिद्दत पूरी होगी मेरी तो चेहरे पर यही हसी बिखरेगी

.... आलोक मेहता ...

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