संदेश

मुट्ठी भर रेत

एक ही चीज के कितने आयाम हो सकते हैं... साहिबान, तजुर्बा एक, कई नाम हो सकते हैं... अब मुट्ठी भर रेत को ही जैसे ले सकते हैं... मायने इसके तेरे मेरे मुताबिक जुदा हो सकते हैं गर शायर हूँ तो कहूँगा जिंदगी इस सी फिसल गयी गर हु कुम्हार तो कहूँगा ये नित नए सांचे में ढल गयी साहिल पे गर कोई बच्चा हूँ तो नए किले बनाऊंगा कसरती पहलवान हूँ गर तो हाथो पे मल जाऊंगा धोकेबाज जो रहा तो तेरी आँखों में झोंक दूंगा इसे गर कारवा में शामिल रहा गुबार में रोक दूंगा इसे शिल्पकार जो रहा तो दुरगा मूरत का हिस्सा होगी किसान जो रहा मेरे फसलो के पीछे का किस्सा होगी एक मुट्ठी भर रेत नजरिया जुदा रहा मतलब बदल गया देख किस तरह पल में कहने सुनने का ढंग बदल गया कोई बड़ी सीख नहीं एक छोटी सी बस बात हैं एक... मुश्किलें परेशानी जिंदगी सबके हजारो मतलब निकलते हैं... अपने मतलब का मतलब जो निकले उसके साथ हो लेती है ये तो साहिबान याद रकियेगा इस मुट्ठी भर रेत को... और इसके अनगिनत रूपों से बुनी भेंट को.... क्युकी हर एक सोचने का होता हैं अलग अंदाज... की सौ मतलब निकलते हैं एक ही बात के.... ... आलोक मेहता...

....तो खुद को बदल देता

बदल जो सकता गर कुछ तो खुद को बदल देता तोड़ पुराने बंध खुद को नए सांचो में ढल देता भुला देता तजुर्बे हार के बिसरा देता जीत की कहानी 'कल' मेरा वजूद न रखता न होती कोई बात जानी पहचानी सोच की दायरे भी असीमित होते ख्यालो की भी कोई सीमा न होती फिर मुझमे दुनियादारी न होती इस पतन में मेरी हिस्सेदारी न होती किसी की मदद से कतराता भी नहीं राह में देख अजनबी घबराता भी नहीं बीते दिनों का कुछ गिला न होता ख्वाब टूटा आँखों में सीला न होता तुझे पर भी कुछ भरोसा रहता उम्मीदों की थाली में तेरा बोसा रहता कितना ही होता अच्छा गर सब ये बदल देता तोड़ पुराने बांध सभी खुद को नए सांचे में ढल देता ... आलोक मेहता..

चल आलोक चल इश्क लड़ाए

चल आलोक चल इश्क लड़ाए प्यार की कुछ हम पींग बढाए कि कब तक यु ही छड़ा रहेगा तन्हा मुंह औंधे पड़ा रहेगा चल कर जतन तन्हाई मिटाए चल आलोक चल इश्क लड़ाए ढूंढे कोई कन्या जो तुझपे रीझे सपनो के तुझ संग बीज जो बीजे बात मन की किसी कन्या को चल दिए बताये चल आलोक चल इश्क लड़ाए कोल्हू के बैल सा काम में जुटा हैं मन का सकल देख संसार लुटा हैं काम काम कर काहे सगरे दिन बिताये चल आलोक चल इश्क लड़ाए रात रात जग तारे गिनता हैं दिन में सोता सपने चुनता हैं रात दिन में टोटल कन्फुजियाये चल आलोक चल इश्क लड़ाए बहुत हुआ अब ये रोना धोना छोड़ अँधेरे मन का ये कोना ख़ुशी ख़ुशी दो बोल ले बतियाये चल आलोक, चल न,,, इश्क लड़ाए... ... आलोक मेहता..

परवाज उसे ही मिलती हैं जो कटी पतंग बदलता हैं

कुछ लोग जब मिलते हैं तो मौसम रंग बदलता हैं सूरज पश्चिम से निकलता हैं अपने ढंग बदलता हैं दिशाए बदल जाती हैं एक मोड़ से इन राहो की सफ़र बदल जाता हैं जब राही "संग" बदलता हैं भूख लाचारी के मुद्दे तज जब फिजूल बातें करते हैं देश बदल जाते हैं जब हुक्मरान जंग बदलता हैं सपनो के फुग्गे* फूटे जो ऐ दिल तू उनका मोह न कर परवाज उसे ही मिलती हैं जो कटी पतंग बदलता हैं सोने चांदी में न तोल बंदगी खुदा की "आलोक" प्यार की निगाह एक पर, वो मलंग बदलता हैं ... आलोक मेहता.. *फुग्गे = गुब्बारे

ख्वाहिशो के मुताबिक ऐ दिल अब हौसला करना

चित्र
Image Courtesy : Google Images औरो से नहीं खुद से ही आगे बढ़ना होगा सफ़र ये मुकम्मल कर गुजरना होगा हालात लाख दुश्वार रहे हैं माजी में माना शिकस्त से नयी राह ले जीत को बढ़ना होगा अपने ही दायरे से निकल उभरना होगा बेइन्तहा भरोसा खुद पे करना होगा हौसलों के मुताबिक तो ख्वाहिशे खूब ही चुना की.. ख्वाहिशो के मुताबिक ऐ दिल अब हौसला करना होगा

स्त्री ...

स्त्री एक अद्भुत विषय एक सम्पूर्ण रचना इसने क्या क्या खोया इसने क्या अस्तित्व पाया कई लोगो को सुना विचार एकत्र किये सबसे सुना की.... क्या हैं ये ? क्या होगी सबसे सटीक परिभाषा इसकी स्त्री सबने चाहा बतलाये क्या हैं अनबुझ पहेली सी उलझती जाती हैं एक शुन्य सी संकुचित अपना अस्तित्व छुपाये कही और अनंत सी विस्तृत होकर सारी सृष्टि कभी समाये हुए स्त्री... सब हैं हैरान परेशान आखिर कैसे व्यक्त करे किसी को ममता की देवी लगी माँ का भव्य रूप देखा किसी ने तो त्याग की मूरत और कहा किसी ने अबला है ये औरत मगर फिर भी कौन सी संज्ञा कौन सा विशेषण ठीक बैठेगा कुछ भी तो ठीक नहीं लगता सभी एकल रूप तो कहते हैं मगर सम्पूर्णता वाली वो बात कहा हैं स्त्री... कौन हैं कैसे पता लगे चारो तरफ अब शोर हैं सबके विचार टकरा रहे हैं मुझे दुःख हैं किसी को सही परिभाषा नहीं मालुम सब अपनी अपनी व्याख्या पर दृढ़ता से अडे हैं और ये मेरी आधी अधूरी रचना इन सब लोगो के एकमत होने की प्रतीक्षा में हैं.... स्त्री.... सब उस अबला के लिए द्रवित हैं मैं कह पड़ता हूँ... मैं सहमत हु मगर पूर्ण रूप से नहीं क्या जरुरी है एक इसी रूप में पहचाना जाये इसे ...

वो, जो हसी.. एक गजल सी, मिल जाए मुझको

गुंजाइश कहाँ कि, अब वो मिल जाए मुझको कि तन्हाई हैं फकत... तनहाई तडपाये मुझको ऐ खुदा, कहते हैं मांगो तो खाली नहीं जाती ऐसी एक दुआ तेरे दर से मिल जाए मुझको जिस तरह उसकी आँखें रजामंद दिखती हैं लबो कि वैसी ही मंजूरी मिल जाए मुझको उसके हसने रोने से चलती हैं महफिले शायरों की वो जो हसी एक गजल सी, मिल जाए मुझको उंगलियों उंगलियों से गुफ्तगू में मसरूफ रहे हथेली उसकी.. मेरी हथेली मिल जाए मुझको मैं भी जानू कनखियों से आंख मिचोली का मजा आँखों आँखों में भी कभी वो, मिल जाए मुझको वो कभी पलके उठा, एक नजर जो फेंक दे इधर दोनों जहा यूँ ही... खैरात में मिल जाए मुझको वस्ल तो रहा... ऐसे ही बस ख्वाब-ओ-ख्याल बनकर हकीकत में दूर... बहुत दूर तक न वो मिल पाए मुझको दिल मेरा नादान ऐसे उनकी बातें कर बहलाए मुझको कि अब तन्हाई हैं फकत... तनहाई तडपाये मुझको ....आलोक मेहता.... (c) copyright 2009.. Aalok Mehta