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निगाहों निगाहों सवाल करना... सुनना खुद को जवाबो में...

निगाहों निगाहों सवाल करना... सुनना खुद को जवाबो में... इश्क अपना वैसा हैं.. पढ़ा था जैसा किताबो में... आलोक मेहता...

क्षितिज पे भी जमी का ये फलक न हो सका...

तुझे क्यों रहा गुमान कि तेरा हो सकूँगा मैं... अपना ही जब मैं अब तलक न हो सका मरासिम हैं ये फकत, बात जान ले... क्षितिज पे भी जमी का ये फलक न हो सका... कहा था तुझे.. कि ये मुमकिन ही नहीं रखू किसी का ख्याल फितरत में शामिल ही नहीं... लाख चाहू तो भी तो ये नहीं मेरे बस में... नादानी जिसे कहते मोहब्बत. मेरी मंजिल ही नहीं... ...आलोक मेहता...

वो आया सफ़र में.. और हैरान कर गया...

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अपने याद आने का सामान कर गया .. जाते वक़्त वो ये एहसान कर गया .. मैं तो गुजर ही जाता बीते लम्हों कि तरह... वो आया, मुझे एक दास्तान कर गया हमसफ़र न कोई होगा.. सोच गुम था मैं... वो आया सफ़र में.. और हैरान कर गया... ..आलोक मेहता...

और तुम्हारे मरने की भी अभी तक कोई खबर नहीं आई हैं...

जाते वक़्त कितना तडपे थे हम लगता था दुनिया बस ख़त्म हो रही हैं.... मुझे लगा था तुझसे दूर हो कर... टूट जाऊंगा मैं... साँस न ले पाउँगा... दम घुट जाएगा... आंखे बाहर को निकल आएगी. ये कमबख्त दिल सिने में सिकुड़ कर दफ़न हो जायेगा आवाज निकलने कि आरजू में भीतर ही घुट के रह जाएगी और आखिर तड़प कर दम तोड़ तुंगा मैं.. मगर प्यार के बाकी सब ख्यालो कि तरह ये भी एक अजीब ही ख्याल था... देखो मैं अभी भी जिन्दा हूँ और तुम्हारे मरने की भी अभी तक कोई खबर नहीं आई हैं... ...आलोक मेहता...

न निभा सकेंगे हम.. गर तुझे शुबा रहा...

गर तुझे शुबा रहा.... क्या निभा सकेंगे हम न निभा सकेंगे हम.. गर तुझे शुबा रहा... ...आलोक मेहता...

जुदा हो जाये मुझसे.. तो मैं मिल जाऊ उसको...

मैं मिल जाऊ उसको.. जुदा हो जाये मुझसे... जुदा हो जाये मुझसे.. तो मैं मिल जाऊ उसको... ..आलोक मेहता...

सयाना हुआ दिल कि अब... दुनियां-जहान देखे हैं...

बदलता वक़्त.. बदलते मौसम... और इंसान देखे हैं... सयाना हुआ दिल कि अब... दुनियां-जहान देखे हैं... चार दिवारी एक छत वाले घर की ख्वाहिश थी... और तो क्या देखा हमने.. ऊँचे मकान देखे हैं... गरीबो की बस्ती में फिर भी गरीबी का जश्न मिला... अमीरों के यहाँ तो अक्सर .. आलम वीरान देखे हैं.. मेरे चालो-चलन पे ऊँगली उठाये जो फिरते हैं... हमने उन कमजर्फो के मैले गिरेबान देखे हैं.. छुप छुपा के दुनिया से वो जुर्म किया करते हैं... और कोई चाहे न देखे वो आसमान देखे हैं.... इस तरह मेल हुआ कातिल और मुंसिफ में... खूनी दीखता नहीं..सबूत-ओ -निशान देखे हैं... लोक तंत्र का अब हर कोई मखौल बनाये हैं... पंचो का फरमान हुआ.. कानून हैरान देखे हैं... खेलो में glamouR को अब स्कर्ट जरुरी होगी किस तरह बना दी गयी नारी इक सामान देखे हैं... मेरी बारी चुप रहा, लगा उसे कोई मतलब नहीं..... अब जब खुद पे पड़ी तो भी बस बेजुबान देखे हैं... वो आज भी खाली बर्तन टटोल के सो जायेगी जिसने अमीरों की महफ़िल में फेके पकवान देखे हैं... "आलोक" अब क्या कहे क्या क्या इस जहान देखे हैं.. शैतानो का डर दिखा इंसान अब लूटे इंसान देख...