मगर शायद तजुर्बा जरुरी था ये.. उल्फत समझने को... लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप - अगस्त 30, 2011 कोई मतलब न था अपने मिलने.. फिर बिछड़ने का... मगर शायद तजुर्बा जरुरी था ये.. उल्फत समझने को... ..आलोक मेहता... लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप टिप्पणियाँ tapesh chauhan16 सितंबर 2011 को 4:34 pm बजेबहुत अच्छा लिखते हैं आप !!! जारी रखिये..शुभकामनाएं !!!जवाब देंहटाएंउत्तरजवाब देंdeewan-e-alok.blogspot.com16 सितंबर 2011 को 8:55 pm बजेBehad Shukriya Tapesh ji...जवाब देंहटाएंउत्तरजवाब देंटिप्पणी जोड़ेंज़्यादा लोड करें... एक टिप्पणी भेजें
कुछ अपनी फितरत... कुछ तेरा कमाल भी... - जुलाई 12, 2012 मसरूफियत भी हैं.. और तेरा ख्याल भी.... कुछ अपनी फितरत... कुछ तेरा कमाल भी... आलोक मेहता.... और पढ़ें
अभी तो मंजिले बेहिसाब हैं.... - सितंबर 13, 2011 जिसे तुम मंजिल कहते हो... वो तो सिर्फ एक पडाव हैं.... कई हैं सफ़र फेरहिस्त में... अभी तो मंजिले बेहिसाब हैं.... आलोक मेहता... और पढ़ें
हसीं अब हसीं.. और हसीं ..... लगता हैं.... - जुलाई 24, 2012 एक बार लिखा था किसी के लिए कभी..... "ख्वाबो ख्यालो में हसीं खूब लगता था... बहुत आम सा लगा रूबरू मिल जाना तेरा..." मगर अब तुमसे मिल कर कहता हूँ.... "हर बार मिल कर इसके माने बदल देते हो.... हसीं अब हसीं.. और हसीं ..... लगता हैं.... " ...आलोक मेहता.... और पढ़ें
बहुत अच्छा लिखते हैं आप !!!
जवाब देंहटाएंजारी रखिये..
शुभकामनाएं !!!
Behad Shukriya Tapesh ji...
जवाब देंहटाएं