मैं ही बदल जाऊँगा... अमां क्या कहती हो ... नए रंग ढल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो..... खुद से मिलते तो.. बनता नहीं कभी... उससे मिलने कल जाऊंगा... अमां क्या कहती हो... उसकी थी आरजू.. जूनून भी था? क्या कभी? बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो... शाम का चूल्हा जलाता हैं यूँ भी हर रोज मुझे... धूप से मैं जल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो... कई बरस गुजरे.. मेरा सावन यूँ ही पुरजोर हैं.... इस रिमझिम से गल जाऊंगा..अमां क्या कहती हो... गोया एक तनहा ही तो नहीं मैं रंज-ओ-ग़म का मारा.... फिर मैं ही ऐसे मर जाऊंगा... अमां क्या कहती हो... आलोक मेहता...
बहुत खूब!!
जवाब देंहटाएंBehad shurkiya Kumaarji...
हटाएंwaah!...
जवाब देंहटाएंthanks a lot sushma
हटाएंWaah bahut khoob!
जवाब देंहटाएंशुक्रिया अर्जुन जी..
हटाएंbeautiful..............
जवाब देंहटाएंanu
Thanks a lot... Anu ji...
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