शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

मुट्ठी भर रेत

एक ही चीज के कितने आयाम हो सकते हैं...
साहिबान, तजुर्बा एक, कई नाम हो सकते हैं...
अब मुट्ठी भर रेत को ही जैसे ले सकते हैं...
मायने इसके तेरे मेरे मुताबिक जुदा हो सकते हैं
गर शायर हूँ तो कहूँगा जिंदगी इस सी फिसल गयी
गर हु कुम्हार तो कहूँगा ये नित नए सांचे में ढल गयी
साहिल पे गर कोई बच्चा हूँ तो नए किले बनाऊंगा
कसरती पहलवान हूँ गर तो हाथो पे मल जाऊंगा
धोकेबाज जो रहा तो तेरी आँखों में झोंक दूंगा इसे
गर कारवा में शामिल रहा गुबार में रोक दूंगा इसे
शिल्पकार जो रहा तो दुरगा मूरत का हिस्सा होगी
किसान जो रहा मेरे फसलो के पीछे का किस्सा होगी
एक मुट्ठी भर रेत नजरिया जुदा रहा मतलब बदल गया
देख किस तरह पल में कहने सुनने का ढंग बदल गया
कोई बड़ी सीख नहीं एक छोटी सी बस बात हैं एक...
मुश्किलें परेशानी जिंदगी सबके हजारो मतलब निकलते हैं...
अपने मतलब का मतलब जो निकले उसके साथ हो लेती है ये
तो साहिबान याद रकियेगा इस मुट्ठी भर रेत को...
और इसके अनगिनत रूपों से बुनी भेंट को....
क्युकी हर एक सोचने का होता हैं अलग अंदाज...
की सौ मतलब निकलते हैं एक ही बात के....
... आलोक मेहता...

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

....तो खुद को बदल देता

बदल जो सकता गर कुछ
तो खुद को बदल देता
तोड़ पुराने बंध खुद को
नए सांचो में ढल देता
भुला देता तजुर्बे हार के
बिसरा देता जीत की कहानी
'कल' मेरा वजूद न रखता
न होती कोई बात जानी पहचानी
सोच की दायरे भी असीमित होते
ख्यालो की भी कोई सीमा न होती
फिर मुझमे दुनियादारी न होती
इस पतन में मेरी हिस्सेदारी न होती
किसी की मदद से कतराता भी नहीं
राह में देख अजनबी घबराता भी नहीं
बीते दिनों का कुछ गिला न होता
ख्वाब टूटा आँखों में सीला न होता
तुझे पर भी कुछ भरोसा रहता
उम्मीदों की थाली में तेरा बोसा रहता
कितना ही होता अच्छा
गर सब ये बदल देता
तोड़ पुराने बांध सभी
खुद को नए सांचे में ढल देता
... आलोक मेहता..