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तेरा अक्स अब भी.. खूब रुलाता हैं....

दिल को अब भी कुछ याद आता हैं.. तन्हाई में कोई कुछ गुनगुनाता हैं... दस्तक सी कोई देता हैं किवाड़ो पर.. गली के नुक्कड़ से कोई बुलाता है... आँखों से सपने गुजरते हैं... या... ख्वाब कोई हकीकत हुआ जाता हैं... मिलने को मचल पड़ती हैं धड़कने दिल अब भी तेरे लिए रूठ जाता हैं... पैर पटक.. लोटता हैं जमीन पर.... सर झटक नाराजगी जताता हैं... बरस पड़ते हैं फिर नैना यूँ ही....कि तेरा अक्स अब भी.. खूब रुलाता हैं.... आलोक मेहता....

Yu jaise..... kal hi ki baat ho…

कितना वक़्त हुआ... तुमसे मिले हुए.. मुद्दत सी.. लगती हैं.. फिर भी.. जेहन में ताज़ी हैं... यूँ जैसे... कल ही की बात हो... नहीं... तेरी मखमली उंगलियाँ हैं जैसे... अब तक मेरे इन हाथो में... किस तरह हौसला देते हुएं.. मेरी हथेलियों पर.. तेरी उंगलियों की पकड़ मजबूत हो जाया करती थी... तेरी नजर अभी भी मेरे चेहरे पर ही.. कही ठहरी हुई हैं... यही वजह हैं जो अब तक रोशन हूँ मैं.. जहाँ मिलते थे कभी हम... वहां जाता हूँ ...तो तुम अक्सर मिल जाती हो.. मुझे छेडती...मुझसे अठखेलियाँ करती हुई.. देखता ही रह जाता हूँ शुन्य में अपलक... जब कभी कहता हूँ "ठीक हूँ मैं " किसी के पूछने पर... तुम जैसे कही से कह पड़ती हो.. "सच बताओ " जब टहलता हूँ यूहीं जब राहो में.. तुम बहुत दूर तक साथ चलती हो मेरे... और फिर वो चले भी जाना मेरे फैसले पर तेरा आंसुओ को मुझसे छुपाते हुए और मेरा कह पड़ना. "कि भूल जाना मुझे क्यूकी मैं तुम्हे हरगिज़ याद ना रखूँगा " उफ़... सच.. यकीं नहीं होता... कितना वक़्त हुआ तुमसे मिले हुए... मुद्दत सी बीती लगती हैं... मगर फिर भी... जेहन में ताज़ा हैं तू इस तरह... यूँ लगता ...

तू नहीं सही.. तेरे संग फिर भी जिंदगी बसर करूँगा मैं....

रह रह कर तेरी और बढ़ पड़ते हैं कदम मेरे... मेरी उम्मीद से जुदा, तेरे नक्श मुझमे बाकी हैं ऐ सनम मेरे तू कही मौजूद हैं मेरी तन्हाई की गुरुर में मेरे अकेलेपन क दंभ में, मेरे अहं के सुरूर में दावा था मेरा की...तू.. मुझमे शामिल न होगा... तेरा कोई भी ख्याल...किसी सूरत... मुझमे दाखिल न होगा... मेरे दिल-ओ-दिवार के दरवाजे... इस तरह बंद होंगे पहरे रहेंगे तमाम, तेरी नफरत के पाबंद होंगे मगर फिर किस तरह.. तू मुझमे जीता हैं... किस तरह हारा हूँ मैं... और तू किस तरह जीता हैं... क्यों तुझे पाने की आरजू अब भी उठती हैं... क्या हैं वजह.. धड़कन बन तू अब भी दिल में धडकती हैं.... साँसे किस तरह तेरे नाम से चढ़ती उतरती हैं... बेचैनिया तेरे ख्याल से अब भी क्यों बढती हैं... कैसा भ्रम था मेरे कि... तुझे भुला दूंगा मैं... बचपना था कि तेरा.. हर नक्श मिटा दूंगा मैं.... जहन में ताज़ा हैं... तेरे साथ का लम्हा हर... तेरे संग याद हैं बस... भूला वो मिलो का सफ़र... मंजिलो का पता नहीं... राह कि ना कोई फ़िक्र... गैरों कि न बात कोई... न कोई अपनों का जिक्र....

सच कहूँ.. अक्स मेरा अब वाकई में खुबसूरत लगता हैं...

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कब ही तेरे बारे सोचा मैंने खुद से ही फुर्सत कहा मिली मुझे तेरी आँखों की नमी बेफिजूल सी लगती रही तवज्जो दू कभी तेरे भी ग़म को ऐसी जरुरत कभी महसूस ही नहीं की मैंने ... अपनी जिंदगी में तेरी मौजदगी का एहसास ही नहीं किया... बस अपने ख्वाबो के पीछे बढ़ता गया तू खुद में घुटती रही मगर एक भी शिकवा कभी किया हो मुझे याद नहीं आता... हमेशा ही ख़ामोशी से मेरा हाल पता कर दबे पाँव लौट जाना आदत सी हो गयी थी तेरी.. जैसे खुद की कोई हस्ती न हो .. मगर आज जब तू किसी और की हो चुकी हैं तो मालुम हुआ ... कि वो तो मैं था जिसकी हस्ती अब कोई मायने नहीं रहे... अब समझ में आता हैं... मेरा वजूद निखर के आता था... क्यूंकि तूने अपने वजूद को मुझ में समां रखा था तू एक आफताब थी जिसने मुझे अपना नूर बक्शा था... और मैं माहताब होकर तेरी रौशनी को अपना समझ बैठा था तू तो फिर पुरनूर हो गयी मुझसे अलग होकर... मगर अब जब तू नहीं तो अमावास के चाँद सा स्याह मैं लगता हूँ... अपने जिस वजूद का गुमान था मुझे उसे ही इन अंधेरो में रोज समेटता हूँ आज इन तन्हाइयो में तेरी नमी अपनी आँखों म...

जो राह में फूल ही मिलते.. साथ निभाना कुछ मुश्किल था...

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जो राह में फूल ही मिलते.. साथ निभाना कुछ मुश्किल था... पत्थरों पे एक दूजे के सहारे ने... हमे खूब मिलाये रखा... मुश्किलों में मिली हमारे रिश्ते को नयी गहराइयाँ... सहूलियतो ने तो दरमियान यार, एक फासला बनाये रखा... एक दूसरे के ग़म बाँट कर कुछ नजदीकी का एहसास हुआ खुश थे तो खुद को उनसे दूर.. खुद में ही छुपाये रखा... इन तकलीफों ने बक्शे हमारी गुफ्तगू को दुआ-सलाम से आगे के मकाम कि अब तलक तो बेफिजूल के तकल्लुफ ने रिश्तो में अजनबीपन जगाये रखा... आलोक मेहता... ********************************************************************************************* jo rah mein phul hi milte to sath nibhna kuch mushkil tha... pathro pe, ek dusre ke sahare ne hume khub milaye rakha.... muskhilo mein mili hamare rishte ko nayi gehraiya.. sahuliyato ne to yaar darmiyaa ek faasla banaye rakha.... ek duje ka gam baant kar kuch aur najdiki ka ehsaas hua... khush the to khud ko unse dur khud mein hi chupaye rakha... in taklifo ne bakshe hamari guftagu ko dua-salam se aage ke makam... ki ab tak be-fijool ke takalluf ...