बुधवार, 13 जनवरी 2010

सच कहूँ.. अक्स मेरा अब वाकई में खुबसूरत लगता हैं...


कब ही
तेरे बारे सोचा मैंने
खुद से ही फुर्सत कहा मिली मुझे
तेरी आँखों की नमी
बेफिजूल सी लगती रही
तवज्जो दू कभी
तेरे भी ग़म को
ऐसी जरुरत कभी
महसूस ही नहीं की मैंने ...
अपनी जिंदगी में
तेरी मौजदगी का एहसास
ही नहीं किया...
बस अपने ख्वाबो के
पीछे बढ़ता गया

तू खुद में घुटती रही
मगर एक भी शिकवा कभी किया हो
मुझे याद नहीं आता...
हमेशा ही ख़ामोशी से
मेरा हाल पता कर
दबे पाँव लौट जाना
आदत सी हो गयी थी तेरी..
जैसे खुद की कोई हस्ती
न हो ..

मगर आज जब तू
किसी और की हो चुकी हैं
तो मालुम हुआ ...
कि वो तो मैं था
जिसकी हस्ती अब कोई मायने
नहीं रहे...
अब समझ में आता हैं...
मेरा वजूद निखर के आता था...
क्यूंकि तूने अपने वजूद को
मुझ में समां रखा था

तू एक आफताब थी
जिसने मुझे अपना
नूर बक्शा था...
और मैं
माहताब होकर तेरी रौशनी
को अपना समझ बैठा था

तू तो फिर पुरनूर हो गयी
मुझसे अलग होकर...
मगर अब जब तू नहीं तो अमावास के
चाँद सा स्याह मैं लगता हूँ...
अपने जिस वजूद का
गुमान था मुझे
उसे ही इन अंधेरो में
रोज समेटता हूँ

आज इन तन्हाइयो में
तेरी नमी अपनी आँखों
में महसूस करता हूँ...
आईने के सामने
अब मैं घंटो बैठा करता हूँ...
क्युकी अश्क तेरे जो अब मेरी आँखों से गिरते हैं
सच कहूँ.. अक्स मेरा अब वाकई में खुबसूरत लगता हैं...


आलोक मेहता...

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