गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

कि फकत एक लफ्ज़ थी ये "चाहत" तुझे जताने से पहले...

तुझसे मिल के मेरी जिंदगी में इसे माने मिले....
कि फकत एक लफ्ज़ थी ये "चाहत" तुझे जताने से पहले...


आलोक मेहता...

अब जहीन हैं हम.. तो एक शिकवे पे याराने टूट जाते हैं...

छुटपन में नादाँ थे जब तक...लड़ते थे फिर मिल जाते थे...
अब जहीन हैं हम.. तो एक शिकवे पे याराने टूट जाते हैं...

आलोक मेहता...

August 20, 2008

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कभी बेधड़क दिल में घुस आये थे मेरे...

वो जो करते हैं अब.. हर बात का तकल्लुफ...
कभी बेधड़क दिल में घुस आये थे मेरे...

आलोक मेहता...

तेरा अक्स अब भी.. खूब रुलाता हैं....

दिल को अब भी कुछ याद आता हैं..
तन्हाई में कोई कुछ गुनगुनाता हैं...
दस्तक सी कोई देता हैं किवाड़ो पर..
गली के नुक्कड़ से कोई बुलाता है...
आँखों से सपने गुजरते हैं... या...
ख्वाब कोई हकीकत हुआ जाता हैं...
मिलने को मचल पड़ती हैं धड़कने
दिल अब भी तेरे लिए रूठ जाता हैं...
पैर पटक.. लोटता हैं जमीन पर....
सर झटक नाराजगी जताता हैं...
बरस पड़ते हैं फिर नैना यूँ ही....कि
तेरा अक्स अब भी.. खूब रुलाता हैं....

आलोक मेहता....

एक बार मिली... ताउम्र..तिश्नगी रही...

तौबा इक निगाह इस कदर बुरी रही..
एक बार मिली... ताउम्र..तिश्नगी रही...


आलोक मेहता...

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो...





मैं ही बदल जाऊँगा... अमां क्या कहती हो ...
नए रंग ढल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो.....

खुद से मिलते तो.. बनता नहीं कभी...
उससे मिलने कल जाऊंगा... अमां क्या कहती हो...

उसकी थी आरजू.. जूनून भी था? क्या कभी?
बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो...

शाम का चूल्हा जलाता हैं यूँ भी हर रोज मुझे...
धूप से मैं जल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो...

कई बरस गुजरे.. मेरा सावन यूँ ही पुरजोर हैं....
इस रिमझिम से गल जाऊंगा..अमां क्या कहती हो...

गोया एक तनहा ही तो नहीं मैं रंज-ओ-ग़म का मारा....
फिर मैं ही ऐसे मर जाऊंगा... अमां क्या कहती हो...

आलोक मेहता...

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

लम्हा जो भी गुजरा.. बेहद खूब गुजरा....

वक़्त गुजरा भी तो क्या खूब गुजरा...
कर सारे ही ख्वाब मंसूब गुजरा....

और क्या कहे क्या रही सोहबत तुम्हारी....
लम्हा जो भी गुजरा.. बेहद खूब गुजरा....

आलोक मेहता...

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

बड़ा ही खूबसूरत... वो सरकार दीखता हैं...






नजरो के शीशो के पार दीखता हैं....
बड़ा ही खूबसूरत... वो सरकार दीखता हैं...

न गुफ्तगू ही रही.. न कोई पहचान का तजुर्बा...
फिर भी मेरे फ़साने का... अहम किरदार दीखता हैं

लाख ही चेहरे गुजरे भले निगाहों से मेरी....
देखा जब दिल में... वही हर बार दीखता हैं....

ज़माने भर से टकरा जाये ये कूबत हैं इसकी....
दिल उसके ही आगे... बस लाचार दीखता हैं...

यु तो खूब रुलाया उसने कतरा कतरा हमे...
क्यों अब रोयेगा... वो जार जार दीखता हैं.....

ज़माने बदलने को तकाज़े... तेरे ही बहुत थे...
अब शक्सियत से मेरी... क्यों शर्मसार दीखता हैं..

टूटना बिखरना किस्से पुराने सब हुए....
ख्वाब हर एक अब... साकार दीखता हैं...

आलोक खूब रहा उससे नफरत का सिलसिला....
मोहब्बत का हमें जिसमे.. अंबार दीखता हैं...


आलोक मेहता...


१२.०४.२०१२... १२:१३ p .m .

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

प्रेम मोबाइल हैं अब.. ये दौर देखते हैं...

ऐ दिल चल .. कोई ठौर देखते हैं....
ठिकाना अपना कोई और देखते हैं...

वही होते हैं अक्सर खयालो में अपने...
जिंदगी का जिनको सिरमौर देखते हैं...

नज़ारे जन्नत के या मुफलिसी के हो..
खुशनुमा निगाहों से हर ओर देखते हैं...

आँखों में कटती हैं अब रातें अपनी...
उनसे कोई होगी.. वो भोर देखते हैं...

लोग दोगले.. रंगे हाथ जिनके हैं...
हर शख्स- हर सू ... वही चोर देखते हैं...

चिट्ठी-प्रेम पत्री का चलन ढल गया
प्रेम मोबाइल हैं अब.. ये दौर देखते हैं...

किसी दौर कभी न मिलके भी कभी रोज करीब थे...
आलोक अब रोज मिल के दूरियों का शोर देखते हैं...

...आलोक मेहता...

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

ये बातें तेरी मेरी...





कहाँ की कहाँ पहुँच जाती हैं.....
ये बातें तेरी मेरी....

ले परवाज़ आसमां छू आती हैं...
ये बातें तेरी मेरी...

एक दूजे से खूब मिलाती हैं...
ये बातें तेरी मेरी...

सुबहो-शाम का फर्क मिटाती हैं...
ये बातें तेरी मेरी...

खवाब-ओ- ख्यालात महकाती हैं...
ये बातें तेरी मेरी....

गिरे कोई.. उसे उठाती हैं...
ये बातें तेरी मेरी...

अजनबी... तुझे अपना बताती हैं....
ये बातें तेरी मेरी...

चाय की चुस्कियों का स्वाद बढ़ाती हैं..
ये बातें तेरी मेरी...

दायरा अपनी सोच का बढ़ाती हैं...
ये बातें तेरी मेरी...

और क्या कहे परत दर परत जिंदगी बनाती हैं...
ये बातें तेरी मेरी....

आलोक मेहता...

06042012

Life...

Life...


Hmm... what to write about it.... it's something we all have (like a Noun).. but something we don't have (like an Adjective) at the same time... It just drags itself to the finish point.. trying to be in the race... to compete in it... to win it... oblivious to everything in or around the track. Just a race......

Sometimes I think what's the purpose of such life at all. We all have dreams. to be some one.. to achieve something... to earn somethings and to lose some... But at the end of the day what's the purpose of all of it. In any case you are going to die at the end. No matter how big you make. No matter how well you have lived your life.. in the end You'll be forgotton.. For sometime you'll be that forgotten picture on the wall.. then a name on some one's ID and in the end that too will fade out. Everything you are will vanish from the face of earth. Even if our name is here for centuries what's the point if we are not here.


So what's the purpose of life then. There can be only one possible explanation... "To Live". To enjoy it fully. After all technically Life is nothing but absence of death.