वक़्त गुजरा भी तो क्या खूब गुजरा... कर सारे ही ख्वाब मंसूब गुजरा.... और क्या कहे क्या रही सोहबत तुम्हारी.... लम्हा जो भी गुजरा.. बेहद खूब गुजरा.... आलोक मेहता...
तेरा पत्थर चूक गया .. यूँ तो.. मेरे सर का निशाना.... ग़म न कर... चोट फिर भी बेहद गहरी.. लगी हैं मुझको... ..आलोक मेहता... from old creations... [17.10.2008]