संदेश

us jaisi e-yaar kisi mein kaha koi baat hogi....
mere mehboob si na koi saari kaaynaat hogi...



mathe pe shikan k megh hain chaahye
lagta hain aaj phir nigaaho se barsaat hogi


dhadkano pe aj subah se koi kaabu nahi...
shayad gahe-bagaghe unse mulakaat hogi


wo humse ab nigaahe bachakar gujarne lage...
ankhe jo chupati hai...labo mein dabi baat hogi...


charcha chid gaya kucha-e-dil mein ulfat ka....
ab to jo bhi hogi bas unki baat hogi...



tanhai mein khayal jiska ki chain lene deta nahi....
jane kab us'se mayassar mulaakaat hogi....


पेशानी किसी शिकन हो, वो मिटाता हैं ऐसे
आवारा बादल कोई, प्यास बुझाता हो जैसे

किफायत से खर्चते हैं वो प्यार की बातें
गरीब चांदी के सिक्के बचाता हो जैसे

मिन्नत भी है, लहजे में तारी शिकायत भी
रूठा वो कोई यार मनाता  हो जैसे

गुफ्तगू कोई हो वो इस अंदाज में करे…
'आलोक' दुआ में अलफ़ाज़ सजाता हो जैसे….


...आलोक मेहता....
17.10.2013
From old collection : written on March, 19 2008


 akhir is jindagi se main kya chahta hu....
ek muddat hui fakat ek jawab is sawal ka na mila....
kya hai arju meri... akhir is jindagi se main kya chahta hu....

 jab tak na mila tha wo, ek tanha uski arjoo thi...
 ab wo hasil hai to badle mein kuch aur chahta hu....

 aksar khwaihishe is tarah mujhse majak karti hai....
tamam koshisho ke bad puri kar... phr koi nai rubaru paata hu...

 is tarah to jindagi ka basar mumkin nahi....
 is kaid-e-hawas-e-jindagi se main bas rihahi chahta hu...

 ye to nahi tha kuch aur hi ban ne ka maksad tha mera....
jara thehar e-dil, main atit mein jaa apna maksad dohrana chahta hu...

 mere katil tu itminan rakh.. main tujh par iljaam na dunga...
main aya hu to bas isliye.. ki apni begunahi jatana chahta hu...

 e-yaar mere pehlue mein baith tu bhi kuch waqt...
 kuch lamha... shiqve jitne hai beech mein.. aj main sab mitaana chahta hu...

 chal accha hi hua... e dost jo tune mujhse se muh fer liya....
ek arse s…

बता घाटा क्या हैं... [two liner]

ठहाकों के बाद महफ़िल में ये भरा सन्नाटा क्या हैं...
मैं भी हंसू जो तेरे साथ खुद पे... बता घाटा क्या हैं...

...आलोक मेहता...

हसीं अब हसीं.. और हसीं ..... लगता हैं....

एक बार लिखा था किसी के लिए कभी.....

"ख्वाबो ख्यालो में हसीं खूब लगता था... बहुत आम सा लगा रूबरू मिल जाना तेरा..."

मगर अब तुमसे मिल कर कहता हूँ....

"हर बार मिल कर इसके माने बदल देते हो.... हसीं अब हसीं.. और हसीं ..... लगता हैं.... "

...आलोक मेहता....

कुछ अपनी फितरत... कुछ तेरा कमाल भी...

मसरूफियत भी हैं.. और तेरा ख्याल भी....
कुछ अपनी फितरत... कुछ तेरा कमाल भी...


आलोक मेहता....

बारहां खुद तड़पता हैं.. मुझको तड़पाता हैं...

चित्र
[IMAGE COURTESY - GOOGLE IMAGES]




करवटों में गुजरती हैं रातें अब अपनी...
ख्वाब ये तेरा यूँ मुझको जगाता हैं...

उल्फत के हैं.. जो बादल ये बरसते...
और मन हैं कि बस भीगे जाता हैं...

जब से बाहों में बसी तेरे बदन कि गर्मी...
रूह में हैं कुछ..जो महके जाता हैं...

शिद्दत-इ-इश्क अब रोज हैं बढती...
मिले भी जो अब तू.. बस बेचैनियाँ बढाता हैं...

उम्र भर को ही हमदम पास अब आ जा
बारहां खुद तड़पता हैं.. मुझको तड़पाता हैं...

एक लिबास तेरा.. और उस पे अदायें भी...
हाल-ऐ-दिल क्या हो.. सब होश जाता हैं...

तेरी कमर के बल पे अटके अरमान जो मेरे...
उंगलियाँ जब ढूंढे.. तू खुद को खुद में छुपाता हैं...

तेरी मेरी आँखों में अब जो साझा हैं सपने...
रिश्ता हैं ये अपना... जो अब गहराता हैं....

...आलोक मेहता....