शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013


पेशानी किसी शिकन हो, वो मिटाता हैं ऐसे
आवारा बादल कोई, प्यास बुझाता हो जैसे

किफायत से खर्चते हैं वो प्यार की बातें
गरीब चांदी के सिक्के बचाता हो जैसे

मिन्नत भी है, लहजे में तारी शिकायत भी
रूठा वो कोई यार मनाता  हो जैसे

गुफ्तगू कोई हो वो इस अंदाज में करे…
'आलोक' दुआ में अलफ़ाज़ सजाता हो जैसे….


...आलोक मेहता....
17.10.2013

गुरुवार, 13 जून 2013


From old collection : written on March, 19 2008


 akhir is jindagi se main kya chahta hu....
ek muddat hui fakat ek jawab is sawal ka na mila....
kya hai arju meri... akhir is jindagi se main kya chahta hu....

 jab tak na mila tha wo, ek tanha uski arjoo thi...
 ab wo hasil hai to badle mein kuch aur chahta hu....

 aksar khwaihishe is tarah mujhse majak karti hai....
tamam koshisho ke bad puri kar... phr koi nai rubaru paata hu...

 is tarah to jindagi ka basar mumkin nahi....
 is kaid-e-hawas-e-jindagi se main bas rihahi chahta hu...

 ye to nahi tha kuch aur hi ban ne ka maksad tha mera....
jara thehar e-dil, main atit mein jaa apna maksad dohrana chahta hu...

 mere katil tu itminan rakh.. main tujh par iljaam na dunga...
main aya hu to bas isliye.. ki apni begunahi jatana chahta hu...

 e-yaar mere pehlue mein baith tu bhi kuch waqt...
 kuch lamha... shiqve jitne hai beech mein.. aj main sab mitaana chahta hu...

 chal accha hi hua... e dost jo tune mujhse se muh fer liya....
ek arse se tishnagi teri roke thi mujhe... ab sukun se mar jaana chahta hu...

 paas aa jara mujhe apne shano par sar rakh jee bhar ro lene de...
 tujhse se jo ki bewafai aaj uska dard is dil se mitana chahta hu....

 tu agar bikhra badhawas hai mere chale jaane se...
shiqva to mujhe bhi apni jindagi se.. tujhe batana chahta hu...

 magar laut kar aana to ab mumkin nahi.. e majhi mere...
kuch sila to teri jafao ka tujhe bhi de jaana chahta hu....

 aalok mehta....

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

बता घाटा क्या हैं... [two liner]

ठहाकों के बाद महफ़िल में ये भरा सन्नाटा क्या हैं...
मैं भी हंसू जो तेरे साथ खुद पे... बता घाटा क्या हैं...

...आलोक मेहता...

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

हसीं अब हसीं.. और हसीं ..... लगता हैं....

एक बार लिखा था किसी के लिए कभी.....

"ख्वाबो ख्यालो में हसीं खूब लगता था... बहुत आम सा लगा रूबरू मिल जाना तेरा..."

मगर अब तुमसे मिल कर कहता हूँ....

"हर बार मिल कर इसके माने बदल देते हो.... हसीं अब हसीं.. और हसीं ..... लगता हैं.... "

...आलोक मेहता....

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

सोमवार, 2 जुलाई 2012

बारहां खुद तड़पता हैं.. मुझको तड़पाता हैं...




[IMAGE COURTESY - GOOGLE IMAGES]




करवटों में गुजरती हैं रातें अब अपनी...
ख्वाब ये तेरा यूँ मुझको जगाता हैं...

उल्फत के हैं.. जो बादल ये बरसते...
और मन हैं कि बस भीगे जाता हैं...

जब से बाहों में बसी तेरे बदन कि गर्मी...
रूह में हैं कुछ..जो महके जाता हैं...

शिद्दत-इ-इश्क अब रोज हैं बढती...
मिले भी जो अब तू.. बस बेचैनियाँ बढाता हैं...

उम्र भर को ही हमदम पास अब आ जा
बारहां खुद तड़पता हैं.. मुझको तड़पाता हैं...

एक लिबास तेरा.. और उस पे अदायें भी...
हाल-ऐ-दिल क्या हो.. सब होश जाता हैं...

तेरी कमर के बल पे अटके अरमान जो मेरे...
उंगलियाँ जब ढूंढे.. तू खुद को खुद में छुपाता हैं...

तेरी मेरी आँखों में अब जो साझा हैं सपने...
रिश्ता हैं ये अपना... जो अब गहराता हैं....

...आलोक मेहता....

बुधवार, 9 मई 2012

बात चुभती हो कोई... तो चलो बात करे...







अब आज अभी से इक नयी शुरुआत करे....
बात चुभती हो कोई... तो चलो बात करे...


दूर तक चलना शिकवो का भी ठीक नहीं...
मिटा दे चलो इन्हें... ख़त्म मामलात करे...


था करार सदियों का ...लम्हों भी चला न वो...
जवाब मांगे भी तो क्या... क्या सवालात करे...

क्या रहेंगे गिले.. जो रूबरू हो पाए हम....
"आलोक" मुझसे गर कहे ... जो औरो से तू बात करे....


आलोक मेहता...

शुक्रवार, 4 मई 2012

क्या हैं कि झूठ में अपना कोई स्वाद नहीं होता...

सच के साथ रखना जरा झूठ का भी हिस्सा...
खालिस सच किसी से अब बर्दाश्त नहीं होता....

जब भी गुजरा हूँ मैं तेरी यादो से होकर....
ख्याल यही आया..ये गुजरना काश नहीं होता....

चाशनी लहजे की अब जुबाँ में बसा सब रखते हैं....
क्या हैं कि झूठ में अपना कोई स्वाद नहीं होता....

आलोक मेहता...

गुरुवार, 3 मई 2012

बस ये जानो.. कई दिन सुन के... लहू रिसता रहा दीवारों से...

कोई तो हो जो चुन ले इनको.. मेरी पलकों के किनारों से
बुँदे उफनती तूफ़ान उठाये.. बहती अँखियों के धारो से...

कहते सुनते उम्र बीती... दुनियादारी न आई मुझे....
सब जग छोटा समझा..मैंने जब भी तौला यारो से...

खालिस बातें करने वाले सुन ले मेरी भी बात ये एक...
सिसकिय जहाँ दबती हों... वहां क्या बदलेगा कुछ नारों से...

धंधे उनके चमकते हैं.. जो खूद खून-पसीना बहाते हैं...
उनको नफा क्यूँकर हो. .. जो उम्मीद करे खिदमतगारो से...

उसने अपने माँ-बाप से कहे . क्या कहू क्या लफ्ज़ वो थे
बस ये जानो.. कई दिन सुन के... लहू रिसता रहा दीवारों से...

देशभक्ति भी आजकल बस एक चलन सी हो गयी हैं....
चार दिन तो रहती हैं... फिर गायब हैं अखबारों से....

रेस्तरां में चख कर.. पसंद नहीं कह... जो चीज छोड़ दी मैंने...
देखा ...वही झूठन पा कुछ लाचार.. इतराते अपने तारो से....

क़त्ल तो सर-ऐ-राह ही हुआ... सर-ऐ-दिन.. सर-ऐ-आम मगर...
एक चश्मदीद न मिला 'आलोक' फिर भी.. उम्मीद तो थी हज़ारों से...

...आलोक मेहता....

We regret that we should have

The irony of life....


We regret that we should have...after losing the time we could have....



aalok mehta....

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

कि फकत एक लफ्ज़ थी ये "चाहत" तुझे जताने से पहले...

तुझसे मिल के मेरी जिंदगी में इसे माने मिले....
कि फकत एक लफ्ज़ थी ये "चाहत" तुझे जताने से पहले...


आलोक मेहता...

अब जहीन हैं हम.. तो एक शिकवे पे याराने टूट जाते हैं...

छुटपन में नादाँ थे जब तक...लड़ते थे फिर मिल जाते थे...
अब जहीन हैं हम.. तो एक शिकवे पे याराने टूट जाते हैं...

आलोक मेहता...

August 20, 2008

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कभी बेधड़क दिल में घुस आये थे मेरे...

वो जो करते हैं अब.. हर बात का तकल्लुफ...
कभी बेधड़क दिल में घुस आये थे मेरे...

आलोक मेहता...

तेरा अक्स अब भी.. खूब रुलाता हैं....

दिल को अब भी कुछ याद आता हैं..
तन्हाई में कोई कुछ गुनगुनाता हैं...
दस्तक सी कोई देता हैं किवाड़ो पर..
गली के नुक्कड़ से कोई बुलाता है...
आँखों से सपने गुजरते हैं... या...
ख्वाब कोई हकीकत हुआ जाता हैं...
मिलने को मचल पड़ती हैं धड़कने
दिल अब भी तेरे लिए रूठ जाता हैं...
पैर पटक.. लोटता हैं जमीन पर....
सर झटक नाराजगी जताता हैं...
बरस पड़ते हैं फिर नैना यूँ ही....कि
तेरा अक्स अब भी.. खूब रुलाता हैं....

आलोक मेहता....

एक बार मिली... ताउम्र..तिश्नगी रही...

तौबा इक निगाह इस कदर बुरी रही..
एक बार मिली... ताउम्र..तिश्नगी रही...


आलोक मेहता...

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो...





मैं ही बदल जाऊँगा... अमां क्या कहती हो ...
नए रंग ढल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो.....

खुद से मिलते तो.. बनता नहीं कभी...
उससे मिलने कल जाऊंगा... अमां क्या कहती हो...

उसकी थी आरजू.. जूनून भी था? क्या कभी?
बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो...

शाम का चूल्हा जलाता हैं यूँ भी हर रोज मुझे...
धूप से मैं जल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो...

कई बरस गुजरे.. मेरा सावन यूँ ही पुरजोर हैं....
इस रिमझिम से गल जाऊंगा..अमां क्या कहती हो...

गोया एक तनहा ही तो नहीं मैं रंज-ओ-ग़म का मारा....
फिर मैं ही ऐसे मर जाऊंगा... अमां क्या कहती हो...

आलोक मेहता...

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

लम्हा जो भी गुजरा.. बेहद खूब गुजरा....

वक़्त गुजरा भी तो क्या खूब गुजरा...
कर सारे ही ख्वाब मंसूब गुजरा....

और क्या कहे क्या रही सोहबत तुम्हारी....
लम्हा जो भी गुजरा.. बेहद खूब गुजरा....

आलोक मेहता...

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

बड़ा ही खूबसूरत... वो सरकार दीखता हैं...






नजरो के शीशो के पार दीखता हैं....
बड़ा ही खूबसूरत... वो सरकार दीखता हैं...

न गुफ्तगू ही रही.. न कोई पहचान का तजुर्बा...
फिर भी मेरे फ़साने का... अहम किरदार दीखता हैं

लाख ही चेहरे गुजरे भले निगाहों से मेरी....
देखा जब दिल में... वही हर बार दीखता हैं....

ज़माने भर से टकरा जाये ये कूबत हैं इसकी....
दिल उसके ही आगे... बस लाचार दीखता हैं...

यु तो खूब रुलाया उसने कतरा कतरा हमे...
क्यों अब रोयेगा... वो जार जार दीखता हैं.....

ज़माने बदलने को तकाज़े... तेरे ही बहुत थे...
अब शक्सियत से मेरी... क्यों शर्मसार दीखता हैं..

टूटना बिखरना किस्से पुराने सब हुए....
ख्वाब हर एक अब... साकार दीखता हैं...

आलोक खूब रहा उससे नफरत का सिलसिला....
मोहब्बत का हमें जिसमे.. अंबार दीखता हैं...


आलोक मेहता...


१२.०४.२०१२... १२:१३ p .m .

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

प्रेम मोबाइल हैं अब.. ये दौर देखते हैं...

ऐ दिल चल .. कोई ठौर देखते हैं....
ठिकाना अपना कोई और देखते हैं...

वही होते हैं अक्सर खयालो में अपने...
जिंदगी का जिनको सिरमौर देखते हैं...

नज़ारे जन्नत के या मुफलिसी के हो..
खुशनुमा निगाहों से हर ओर देखते हैं...

आँखों में कटती हैं अब रातें अपनी...
उनसे कोई होगी.. वो भोर देखते हैं...

लोग दोगले.. रंगे हाथ जिनके हैं...
हर शख्स- हर सू ... वही चोर देखते हैं...

चिट्ठी-प्रेम पत्री का चलन ढल गया
प्रेम मोबाइल हैं अब.. ये दौर देखते हैं...

किसी दौर कभी न मिलके भी कभी रोज करीब थे...
आलोक अब रोज मिल के दूरियों का शोर देखते हैं...

...आलोक मेहता...