बुधवार, 16 मार्च 2011

"aalok" Wo gaya to, naya dard na koi de gaya..

uske baad dil ne kisi ko apna jatana chod diya…
Ulfat mein ab humne jhuti aas lagana chod diya….

Ek waqt tha uski khatir hum raat jagayi rakhte the...
Ab wo nahi to... humne bhi... chiraag jalana chod diya…

Unke daman se juda hui jab se ye ungliya apni…
Unhone apni aankh mein kajal lagana chod diya….

Jis roj se suna wo shahar chod ye chale gaye..
Humne bhi yu hi galio mein.. aana jaana chod diya….

Is hijr ne mod diya jindagi se yu moh mera…
Humne jine ka apna har ek... bahana chod diya….

mujhse taalukaat ka dawa tha uska mehfilo mein
Jisne ab raaho mein mujhse haath milana chod diya…

Ab to us par yaki raha na khud par aitbaar hi hain…
Usne jab se badi behrami se yaki-e-dostaana tod diya…

ab bhi sulagti hain seene mein use paane ki khwahish kahi
apni chahat ka isme chahe... usne.. alaw jalana chod diya…

Uske ek bulawe par sab chod-chaad kar chal pada…
dil ne nayi umeedo par phr ek khawab purana chod dia….

Wo chala gya meri dunia lekar se sab apne saath hi…
Aur meri khatir bus usne ye ek afsaana chod dia…

Sab taaruf logo ke usne apni yaad par mita diye…
mere hisse bas ek apna... naam dohraana chod dia…

"aalok" Wo gaya to, naya dard na koi de gaya..
nasthar chuba ke bas wahi ek jhakhm purana chod dia...


...aalok mehta...

dated - 08-06-2008
(with slight modifications)

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

जिंदगी नए सफ़र निकल गयी हैं.

जिंदगी एक नए सफ़र पे जा रही हैं... रोज कुछ नए मोड़ आ रहे हैं.. ऐसे में ख़ुशी भी और कुछ खुद को साबित कर जाने का जूनून भी हैं तो साथ ही आने वाले कल को लेकर कुछ डर... कुछ संशय भी हैं... इन्ही बातो को सोचते ये रचना लिखी गयी... ये रचना से ज्यादा दिल से निकली कुछ बातें हैं.. जो आप लोगो से बांटनी चाही...

(p .s . इस जनवरी में मैं सनदी लेखाकार मतलब.. chartered accountant बन गया... :) )

रफ़्तार इन पलों की बढ़ गयी हैं...
जिंदगी नए सफ़र निकल गयी हैं..
सपने यू तो निगाहों में कई हैं...
राहे अनजानी मगर मिल गयी हैं...

शुबहा हैं... कुछ कदमो की बेकली हैं.
मुश्किलों की भी कुछ आहट मिली हैं...
वक़्त लगेगा मगर ढाल लूँगा खुद को
ये जो नए सांचे जिंदगी ढली हैं.....

दौड़ में सिर्फ बने ही नहीं रह जाऊंगा
जीत के फिर एक दफा.... मैं दिखाऊंगा ...
लड़ाई के कायदों से अभी अनजान सही...
तमाम कायदे एक दिन बदल जाऊंगा...

...आलोक मेहता..

गुरुवार, 3 मार्च 2011

तू नहीं मेरे ख्वाबों जैसी...

तू नहीं मेरे ख्वाबों जैसी...




चेहरे के नक्श जुदा हैं....
लब से जो गिरे वो लफ्ज़ जुदा हैं...
कदकाठी... सीरत सब अलग हैं ...
कुछ भी तो नहीं.. जो मिलता हो उस'से
तू नहीं मेरे ख्वाबों सी....

फिर भी कुछ अपनी सी लगती हैं....
तेरी आवाज़ की खनक भाती हैं कानो को...
नजरो से तेरी पहचान भली लगती हैं...
जानता हूँ की शायद न फलेगा ये...
रिश्ता मगर तुझसे जोड़े जाता हूँ
जब साथ होती हैं... तो तुझसे जुड़ जाता हूँ...
तन्हाई में तुझे उस'से मिलाता हिचकिचाता हूँ...
क्युकी नहीं तू मेरे ख्वाबों जैसी...

क्या जाने क्या वजह हैं...
जो तू अब भी.. मेरे जेहन में हैं...
दिल कहता हैं...
तू तो नहीं थी उसकी ख्वाइश...
फिर दिल को क्यों फुसलाता हु...
डरता हूँ... खुद से... अपने ही फैसले से....
क्यूंकि तू नहीं मेरे ख्वाबों जैसी..


मगर.... फिर भी.. अपनी सी लगती हैं.....


...आलोक मेहता...