गुरुवार, 20 जनवरी 2011

सफ़र-ऐ-जिंदगी

क्या हासिल हैं मेरी इस जिंदगी का...
सोचता हूँ.. तो खालीपन ही पाता हूँ

टूटती साँसे.. डूबती नब्ज़.. बिखरी रूह..
ख़त्म होती कहानी का हिस्सा बना जाता हूँ .

दूर हो मेरे माझी.. मेरे दोस्त.. मेरे यार से...
एक गुमनाम जिंदगी मैं जिए जाता हूँ...

इतनी तनहा हो रही हैं ये जिंदगी बसर..
अपना साया भी जो देखू.. सिहर जाता हूँ..

कोई हैं या नहीं इस जहाँ मेरी खातिर..
जवाब देते इस सवाल का मैं घबराता हूँ...

नाकाम न हो जाऊ रिश्तो की कसौटी पर...
सोच नए रिश्ते बनाते मैं कतराता हूँ..

खुद पर भी नहीं यकीं अब मुझको...
खुद से भी अब तो.. मैं, नजरे चुराता हूँ...

कोई इख्तियार नहीं रहा अपनी हस्ती पर...
कुछ चाहता हूँ... और कुछ.. मैं कह जाता हूँ

मेरी तन्हाई का न उड़े मखौल इस महफ़िल...
झूठे अपने यारो का मैं दम भरे जाता हूँ..

दुनिया से टकराऊं .. कहाँ कूबत बाकी..
खुद से चिढ़ता हूँ . खुद पर ही झल्लाता हूँ...

दौर गुजरा हैं उल्फत का यूँ भी मुझ पर..
नाम-ऐ-मोहब्बत लेते मैं काँप जाता हूँ...

किसी शय की तमन्ना यूँ तो नहीं मुझे...
फिर भी उसे दूर जाता देख सहम जाता हूँ

जिंदगी मेरी यार अब ये अजीब पहेली हैं..
हर रोज इसके पेच में कुछ और उलझ जाता हूँ..

...आलोक मेहता.. .


( एक पुरानी रचना थोड़ी फेर बदल के साथ)

बुधवार, 19 जनवरी 2011

नहीं आती कहनी रूमानी बातें...

मुझे कहाँ आती हैं कहनी...
ख्वाबो की सुहानी बातें
मुझ से तो रूठी रहती हैं
सारी ही पुरानी बातें..
मुझमें कहा हैं हुनर
कह पाऊं जुबानी बातें
मुझे.. तो सिर्फ उल्फत हैं...
नहीं आती कहनी रूमानी बातें...

...आलोक मेहता...

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

क्या हुआ जो हर शय तुझसे लड़ने पे है आमादा




यूँ रो-रोकर ना अपने जख्मो की नुमाइश कर...
खुद ही संभल जा... किसी से मदद की न फरमाइश कर
क्या हुआ जो हर शय तुझसे लड़ने पे है आमादा
अब जो मिला हैं मौका तो अपने भी जोर की आजमाइश कर...

..आलोक मेहता...



yu ro rokar na apne jakhmo ki numaish kar...
khud hi sambhal jaa kisi se madad ki na farmaish kar...
kya hua jo har shay tujhse ladne pe hai aamaada...
ab mil hai mauka, to jara apne bhi jor ki aajmaish kar...

aalok mehta...

(from my old collection)

बुधवार, 12 जनवरी 2011

फिर वही हैं तन्हाईयाँ.. फिर ये मन उदास है..



{Image courtesy :- voiceinrecovery.wordpress.com)

ख्वाब देखता हूँ मैं.. कि, वो फिर मेरे यूँ पास हैं ..
खिल गया मेरा ये मन, उम्मीदों को मिली परवाज़ हैं
पर आंख खुली जो मेरी.. फिर वही एहसास हैं...
फिर वही हैं तन्हाईयाँ.. फिर ये मन उदास है..


Khwab dekhta hun main.. ki, wo phir mere yun paas hain.
khil gaya mera ye man.. ummeedo ko mili parwaaz hain..
par aankh khuli jo meri.. phir wahi ehsaas hain..
phir wahi hain tanhaiyan.. phir ye man udaas hain...


..aalok mehta...

(from my old collection)

चाँद फिर अब ये... थोडा सीला सा लगता हैं...


(Image Courtesy : Layoutsparks.com)

कुम्हलाया थोड़ा .... कुछ पीला सा लगता हैं
हिल गया जगह से.. जरा ढीला सा लगता हैं...
रात भर रोई हैं फिर से आंखे किसी की...
चाँद फिर अब ये... थोडा सीला सा लगता हैं...

...आलोक मेहता...




kumhalaya thoda, kuch peela sa lagta hain..
hil gaya jagah se, jara dheela sa lagta hain..
raat bhar barsi hain phir se aankhein kisi ki...
chaand phr ab ye.... thoda seela sa lagta hain...

...aalok mehta..

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

सोचता हूँ मैं....


(Image Courtesy :- Google Images)

सोचता हूँ मैं....
तेरी राह कभी मेरी राहो से जुड़ जायेंगी
कभी तो होगा जब तू भी मुझे चाहेगी....
खयालो से इतर हकीकत में मिलेगी मुझसे
ख्वाबो के सिवा निगाहों में रोशन हो जायेगी...


सोचता हूँ मैं.
यु ही कही किसी सूरत जो तू मिल जायेगी
निगाहें मिले.. निगाहें निगाहों में रह जायेगी...
न होंगी अजनबी हिचकिचाहट बर्ताव में...
एक अनजानी कशिश दरमियाँ रवां हो जायेगी

सोचता हूँ मैं...
यु तो असलियत से परे तू मिल जायेगी...
मगर असल जिंदगी में क्या वजूद पाएगी....
कल्पनाओं के धरातल पे उकेरी जो सूरत ...
वास्तविकता की जमीन पे क्या शक्ल पाएगी..



...आलोक मेहता..

हाँ वो मेरी ही कहानी थी...


हो जाना था जिसमे मेरा तुझको....
जिसमे जिंदगी हमे संग बितानी थी...
अफसाना था वो मेरा ही..
हाँ वो मेरी ही कहानी थी...

तेरी राहे न होनी थी जुदा...
मंजिल संग जिसमे पानी थी
अफसाना था वो मेरा ही
हा वो मेरी ही कहानी थी

झूठ से परे सच रहना था...
मुक्तसर जिसमे हर बात रह जानी थी...
अफसाना था वो मेरा ही
हा वो मेरी ही कहानी थी

इन्तजार जिसमे कभी लिखा न था...
आहट को जिसमे नजरे न लगानी थी..
अफसाना था वो मेरा ही
हा वो मेरी ही कहानी थी

मगर तू न मिल सका मुझको...
उम्र तनहा जिसमे बितानी थी ....
अफसाना था वो मेरा ही
हा वो मेरी ही कहानी थी ...
aalok mehta

शनिवार, 8 जनवरी 2011

वो पल दो पल आये और पास रह जाए

तेरे तबस्सुम का दिल में एहसास रह जाए
फिर चली जाए के या फिर ये सांस रह जाए

उसकी जिद ये है कि यक-ब-यक ये टूटे...
मुझे डर कही न बाकी कोई फांस रह जाए...

दूरियाँ लाख बढ जाए... एक शर्त ये रहे...
लौट आने कि दरमियाँ आस रह जाए..

इनयात मिले तेरी या कि बेरुखी हो..
मौजूदगी का तेरी बस विश्वास रह जाए

तुझे मिला करे जहा भर के सब मकाम....
मेरे हिस्से तेरी बस ये तलाश रह जाए...

मेरे दयार में तुम दबे पाँव ही आना...
कि आहट पे दिल ये बदहवास रह जाए

आलोक उसे कह दे कि उसकी तमन्ना हैं ...
वो पल दो पल आये और पास रह जाए...


.आलोक मेहता..


.....................................




tere tabassum ka dil mein ehsaas reh jaaye
phir chali jaaye ke ya phir ye saans reh jaaye


uski jid ye hain ki yak-b-yak ye tute
mujhe dar kahi na baki koi faans reh jaaye

duri laakh badh jaaye.. ek shart ye rahe..
laut nake ki darmiyaan aas reh jaaye..


inaayat mile teri yaa ki berukhi ho
maujudgi ka teri bas vishwaas reh jaaye

tujhe mila kare jaha bhar k sab makam
mere hisse teri bas ye talaash reh jaaye

mere dayar mein tum dabe paanw hi aanaa
ki aahat pe dil ye badhawas reh jaaye...


aalok use keh de ki uski tamnna hain
wo pal do pal aaye aur paas reh jaaye..

...aalok mehta.

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

सच कहना... इसीलिए खुद को भुलाने की कसम दी थी ना

तुझे था अंदाजा कि तेरी याद बेहद बुरी गुजरेगी मुझ पर
भांप लिया था .. कि ये तनहाई.. मुझे कही का न छोड़ेगी..

सच कहना... इसीलिए खुद को भुलाने की कसम दी थी ना.....

...आलोक मेहता....

tujhe tha andaaja ki teri yaad behad buri gujregi mujh par...
bhanp liya tha... ki ye tanhaai.. mujhe kahi ka na chodegi ....

sach kehna isiliye khud ko bhulane ki kasam di thi naa......

aalok mehta...

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

गर ये जिद न होती तो... जिंदगी कितनी मुश्किल होती.. नहीं!

बिछड़ते वक़्त ख्वाइश थी तेरी, कि भूल जाऊ मैं तुझको...
और मैं कर रहा था जिद तुझे ता-उम्र याद रखने की....


अब सोचता हूँ ... गर ये जिद न होती तो... जिंदगी कितनी मुश्किल होती.. नहीं!


...आलोक मेहता...






bichadte waqt khwaish thi teri, ki bhul jaata main tujhko...
aur main kar raha tha jid ta-umr tujhe yaad rakhne ki...

ab sochta hu.. gar ye jid na hoti to jindagi kitni mushkil hoti ... nahi!....

......aalok mehta...

कभी तुझे मेरी जरुरत रहे..

मैं नहीं तो तू ही सही...
किसी सूरत ये सूरत रहे..
कभी तू रहे मेरी होकर...
कभी तुझे मेरी जरुरत रहे...

सोमवार, 3 जनवरी 2011

दुनियादारी उससे भी हम इस कदर निभा लेते हैं... ...

दुनियादारी उससे भी हम इस कदर निभा लेते हैं... ...
उसके काँधे पे सर रख.. कद अपना... बढ़ा लेते हैं...

नाउमीदी की जंजीरे फलक जो मेरा निगल जाए...
यादो की परवाज़ लगा हम आसमा अपना... बढ़ा लेते हैं...

यूँ ही कहा हो पाती हैं... रूह की ये सरगोशियाँ
इसरार उनका होता हैं..तो कुछ हम भी.. फरमा लेते हैं

दीवारों की फ़िक्र कहा.. जितनी ही दरमियाँ निकले....
दरवाजा गर न बन पाए... हम रोशनदान... बना लेते हैं...

अपने ग़म को फुर्सत कुछ यूँ भी नहीं मिल पाती हैं...
वो जो हसने लगते हैं ..तो फिर हम भी मुस्कुरा लेते हैं...

हमसे नहीं तो किससे हो... उल्फत का फिर सिलसिला ...
आलोक हमी से बिगड़ते हैं.. हमी से फिर बना लेते हैं...


...आलोक मेहता...



duniaadaari us'se bhi hum is kadar nibha lete hain...
uske kaandhe pe sar rakh... kad apna.. badha lete hain...


naumeedi ki janjeere kabhi falak jo mera nigal jaaye...
yaado ki parwaaz laga.. hum assama apna.. badha lete hain..


yu hi kaha ho paati hain.. ruh ki ye sargoshiyaa...
israar unka hota hain.. to kuch hum bhi farmaa lete hain...


diwaaro ki fikr kahan.. kitni hi darmiyaa nikle...
darwaaja gar na ban paaye.. hum roshandaan bana lete hain...


apne gham ko fursat kuch yu bhi nahi mil paati hain...
wo jo hasne lagte hain.. to phir hum bhi muskura lete hain...


humse nahi to kis'se ho.. unki ulfat ka phir silsila...
"aalok" humi se bigate hain.. phir humi se bana lete hain...


...aalok mehta....