गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

ढके जो बादल.. तो क्या आसमा नहीं??

ना सही तू मेरी दुनिया.. मेरी दास्तान जाहिर माना तेरा निशा नहीं...
मगर न दिखे तो सूरज नहीं.. ढके जो बादल.. तो क्या आसमा नहीं??

...आलोक मेहता...

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

मेरी पहली कहानी... इत्तेफाक.....


[image courtesy : google images]



इत्तेफाक.....


उफ़... आज फिर से देर हो गयी... ये बिलकुल आखिर वक़्त पे निकलने की आदत कब बदलेगी मेरी.. तेजी से कदम बढ़ता हुआ.. चंद हाँफते कदमो के साथ मैं अपनी कोचिंग क्लास में दाखिल होता हूँ... वो वही बैठी हुई हैं.. अपनी जगह पर.. सबकी नजरे दरवाजे की तरफ उठती हैं...उसकी भी... हम दोनों की निगाहे टकराती हैं और दोनों मुस्कुरा उठते हैं..वो शायद शिस्टाचार के नाते.. और मेरी तो आप अब तक समझ ही गये होंगे... फिर वक़्त रेंगने लगा... और करीब १ घंटे की क्लास मेरे वक़्त के हिसाब से जाने कब खतम हुई... बाहर आये और एक हलकी मुस्कराहट उसे देकर.. देर तक उसे जाते फिर देखता रहा...


यही एक क्रम रोज चलता था... बिना नागा बिना किसी छुट्टी के.. पहली ही नजर में उससे एक रिश्ता हो गया था... उससे पहली मुलाक़ात मेरी जिंदगी के चंद सबसे खुबसूरत लम्हों में से एक हैं... फिर भी अब तक उससे जाहिर तौर पे कुछ खास नहीं हो पाया...

अवि... सुभाष ने मुझे आवाज दी... शायद सुभाष को भी वो पसंद हैं....उसने ही हम दोनों को मिलवाया था... वैसे तो सुभाष मेरा बहुत चहेता दोस्त हैं.. मगर फिर भी उसका उसके बारे में बात करना मुझे पसंद नहीं हैं...

"आज बरिस्ता चलेगा.. कॉफ़ी के लिए.." मुझे याद आया.. कुछ दिन पहले मैंने उसे कहा था बरिस्ता जाने के लिए...


"हाँ यार.. चलते हैं..." मैंने कहा.

बरिस्ता पहुच कर मैंने आज सुभाष से कह ही दिया, "वो मुझे बहुत पसंद हैं यार... उसकी बातें.. उसका व्यवहार सब बहुत अच्छा लगता हैं.." कुछ मदद कर न यार"

कुछ पलो के लिए तो वो मेरी सूरत देखता रहा... फिर जैसे नींद से जाग कर बोला, "अच्छा!!.. क्यूँ नहीं यार...."

"वो साइंस के लिए ट्यूशन ढूंढ़ रही हैं... मैंने तो उसे कह दिया कि मुझे भी पढनी हैं तो कोई मिलती हैं तो बताऊंगा... तू अब फटाफट कोई जुगाड़ कर ट्यूशन का..., " मैंने उससे जिद भरे लहजे में कहा..

"पर तेरी तो साइंस अच्छी हैं..." सुभाष ने कहा....

"हाँ..मगर उसके लिए तो मैं किसी भी चीज में बुरा हो सकता हूँ..." मैंने फ़िल्मी सा डाइलोग मारते हुए कहाँ..और हम दोनों ठहाका मार हंस पड़े...


फिर सुभाष के जुगाड़ की बदौलत एक ट्यूशन मिली ... थोड़ी दूर थी.. हम दोनों के लिए ही .. मगर मेरे लिए तो जैसे मुह मांगी मुराद ही थी ... और सोने पे सुहागा ये की हमारे कोर्स के वह सिर्फ हम दोनों ही थे.. और टीचर महोदय भी हमसे ज्यादा बाकी बच्चो में ज्यादा व्यस्त थे... बस फिर क्या था... धीरे धीरे इधर उधर की बातें शुरू हुई... कुछ उसकी कुछ मेरी जिंदगी एक दूजे से परिचित हुई....

'ऐसे चलेगा तो कैसे पढेंगे हम..." उसने फिर कहा ..

उफ़ पढना किसे हैं... काश मैं कह पाता.. "हाँ ये तो हैं... ऐसे तो नहीं चल पायेगा..." यही कहना पड़ा हार कर...

किस्मत कमबख्त को मेरी जरा भी ख़ुशी मंजूर नहीं...

"कल से तो इस टूशन में आने का कोई फायदा नहीं.. कोई और देखते हैं..." उसके होटों से सुनते ही एक फांस सी चुभ के रह गयी... उसकी आँखों की तरफ देखा.. कोई भाव नहीं थे... दर्द सा utha...बस कमबख्त आँख से आंसू ही टपकने बाकी थे...

भरे मन से उसे अलविदा कहा और घर जाते ही सुभाष को फ़ोन मिलाया और प्लान के फेल होने की बात बताई... फिर कोई और ट्यूशन ढूंढ़ने की बात ठहरी

अगला दिन बीतते एक और दोस्त का फ़ोन आया.. और उसने एक टीचर के बारे में बताया...

इस बार मैंने iraada kiya की उसे इसके बारे में अभी कुछ नहीं बताऊंगा... पहले खुद तसल्ली कर लूँ.. फिर उसे भी बुला लूँगा... फिर से फिजूल हसरतो को उड़ान देने से क्या फायदा.. नीचे गिरने पर ख्वामखा में बहुत दर्द होता हैं...

खैर पहुच गये नियत समय पर नए मास्टर साहब के पास... जान कर ख़ुशी हुई कि मेरे अलावा सिर्फ एक लड़की और हैं वहां पर.. अरे कहानी में कोई ट्विस्ट नहीं आ रहा... ख़ुशी इसलिए हुई कि फिर से उसके करीब जाने का कुछ तो मौका हैं...

बस अब तो यही एक ख्वाहिश थी.. कि ये साहब कुछ ढंग पढ़ाने वाले निकले ताकि उसको भी अगले दिन से यहाँ बुलाया जा सके...

१५ मिनट से ऊपर हो गये.. मगर ये साहब शुरू करने को तैयार ही नहीं थे... पूछा तो कहते हैं..."अभी किसी और को भी आना हैं.. उसके आते ही शुरू करते हैं..."

सच बोलू...कोफ़्त सी हो गयी थी साहब... यहाँ हमारे जीने मरने पे बनी हैं.. और ये किसी का इन्तजार कर रहे हैं...

आखिरकार पूछ ही लिया.. "कौन आने वाला हैं सर..."

"आने वाला नहीं.. आने वाली हैं..." उन्होंने कहा....


कौन सर... जिज्ञासा बढती जा रही थी...

"हैं एक लड़की.. रश्मि करके..."

"कौन?????" उफ़.. धड़कन बढ़ गयी.....सुधि पाठक समझ गये होंगे कि अभी तक जिसका नाम पूरी कहानी में जाहिर नहीं हुआ.. उस शख्स का नाम "रश्मि" हैं...

ये वो नहीं हैं... फकत इत्तेफाक हैं... दिल ने कहा...

रश्मि कौन??? मैंने पूछा..

"रश्मि अरोरा".... सुनते ही दिल बल्लियों उछलने लगा..... नहीं वो कैसे हो सकती हैं मैंने कहाँ.. इस ट्यूशन के बारे में तो मैंने सुभाष को भी नही बताया अभी.. तो उसे कैसे पता होगा... कोई और होगी... मगर क्या हसी इत्तेफाक हैं...

और आखिरकार एक आवाज आई.. जो उस कमरे में मौजूद बाकि दो लोगो का तो पता नहीं.. पर मेरे कानो को बेहद मधुर लगी... ये भी वैसा ही स्कूटर चलाती हैं... चलो अच्छा हैं...

और फिर किसी के कदमो की आवाज़... हलके हलके जमीं पे उड़ते से हुए... जैसे की उस मशहूर गाने को गुनगुनाते आ रहे हो.. "आजकल पाँव जमी पर नहीं पड़ते मेरे.."

और दरवाजा खुला.. फिर से सबकी नजरे दरवाजे की तरफ... मेरी भी...

और फिर नजरे मिली... पहले पहल दोनों जोड़ी आँखें आश्चर्य से फैली... और फिर मुस्कराहट में तब्दील हुई... और इस बार होंट कुछ ज्यादा ही फैले... दोनों के ही..

हाँ ये तो वही हैं... मेरी रश्मि अरोरा...

मगर कैसे????


माना इत्तेफाक हैं... फकत इत्तेफाक.. मगर क्या हसी इत्तेफाक हैं... वो एक शख्स जिसके आने की रत्ती भर भी उम्मीद नहीं थी.. आ गयी.. अब उसके जिंदगी में आने की उम्मीद भी कुछ पुख्ता हो चली हैं.....



..आलोक मेहता...