बुधवार, 21 मार्च 2012

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

तेरा नुकसान न होने दूंगा... जाये जो मेरा नफा जाता हैं....

जब अँधेरा स्याह गहरा जाता हैं...
तेरा नाम जुबा पर आ जाता हैं...

अब भी बहारें खिल उठती हैं...
चमन में जब तू छा जाता हैं...

तेरी क्या वो तो तू ही जाने
मेरी भी तू ही बता जाता हैं...

मंजर-ऐ-दिल बंजर हो जब
आँखों से कुछ बहा जाता हैं...

उल्फत का बोसा कैसे निगले...
नफरत जो रोज चबा जाता हैं..

तेरा नुकसान न होने दूंगा...
जाये जो मेरा नफा जाता हैं....

आलोक दिल में वो अब हैं...
जो दिल से चला जाता हैं...

...आलोक मेहता....