शुक्रवार, 9 मार्च 2012

तेरा नुकसान न होने दूंगा... जाये जो मेरा नफा जाता हैं....

जब अँधेरा स्याह गहरा जाता हैं...
तेरा नाम जुबा पर आ जाता हैं...

अब भी बहारें खिल उठती हैं...
चमन में जब तू छा जाता हैं...

तेरी क्या वो तो तू ही जाने
मेरी भी तू ही बता जाता हैं...

मंजर-ऐ-दिल बंजर हो जब
आँखों से कुछ बहा जाता हैं...

उल्फत का बोसा कैसे निगले...
नफरत जो रोज चबा जाता हैं..

तेरा नुकसान न होने दूंगा...
जाये जो मेरा नफा जाता हैं....

आलोक दिल में वो अब हैं...
जो दिल से चला जाता हैं...

...आलोक मेहता....

6 टिप्‍पणियां:

  1. MANJRE DIL BANJAR HO JAB,AANKHO SE KUCH BAHA JATA HAE....
    KHOOBSURAT SI GAZAL

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  2. उल्फत का बोसा कैसे निगले...
    नफरत जो रोज चबा जाता हैं..

    वाह लाजवाब शेर है आपकी इस गज़ल का ...

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  3. जब अँधेरा स्याह गहरा जाता हैं...
    तेरा नाम जुबा पर आ जाता हैं...



    ये दिल की लगी है इसे अंधेरों से बचाए रखना
    नाम जुबां पे हो जब उजालों को सजाये रखना .....

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    1. andhero se bachanae ki tanha surat hain ye..
      uska naam ek in labo par sajaaye rakhna..

      Harkirat 'Heer' ji... Aapke blog par aane se behad protsaahan mila...

      behad behad shukriya....

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