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स्त्री ...

स्त्री
एक अद्भुत विषय
एक सम्पूर्ण रचना
इसने क्या क्या खोया
इसने क्या अस्तित्व पाया
कई लोगो को सुना
विचार एकत्र किये
सबसे सुना की.... क्या हैं ये ?
क्या होगी सबसे सटीक परिभाषा इसकी

स्त्री
सबने चाहा बतलाये क्या हैं
अनबुझ पहेली सी उलझती जाती हैं
एक शुन्य सी संकुचित
अपना अस्तित्व छुपाये कही
और अनंत सी विस्तृत होकर
सारी सृष्टि कभी समाये हुए

स्त्री...
सब हैं हैरान परेशान
आखिर कैसे व्यक्त करे
किसी को ममता की देवी लगी
माँ का भव्य रूप देखा किसी ने
तो त्याग की मूरत और
कहा किसी ने अबला है ये औरत
मगर फिर भी
कौन सी संज्ञा कौन सा विशेषण
ठीक बैठेगा
कुछ भी तो ठीक नहीं लगता
सभी एकल रूप तो कहते हैं
मगर सम्पूर्णता वाली वो
बात कहा हैं


स्त्री...
कौन हैं कैसे पता लगे
चारो तरफ अब शोर हैं
सबके विचार टकरा रहे हैं
मुझे दुःख हैं
किसी को सही परिभाषा
नहीं मालुम
सब अपनी अपनी व्याख्या पर
दृढ़ता से अडे हैं
और ये मेरी आधी अधूरी रचना
इन सब लोगो के एकमत होने
की प्रतीक्षा में हैं....

स्त्री....

सब उस अबला के लिए द्रवित हैं
मैं कह पड़ता हूँ...
मैं सहमत हु मगर पूर्ण रूप से नहीं
क्या जरुरी है एक इसी रूप में पहचाना जाये इसे
एक और विचार हैं
कि शक्ति रूप माने इसको
मगर क्षमा…

वो, जो हसी.. एक गजल सी, मिल जाए मुझको

गुंजाइश कहाँ कि, अब वो मिल जाए मुझको
कि तन्हाई हैं फकत... तनहाई तडपाये मुझको

ऐ खुदा, कहते हैं मांगो तो खाली नहीं जाती
ऐसी एक दुआ तेरे दर से मिल जाए मुझको

जिस तरह उसकी आँखें रजामंद दिखती हैं
लबो कि वैसी ही मंजूरी मिल जाए मुझको

उसके हसने रोने से चलती हैं महफिले शायरों की
वो जो हसी एक गजल सी, मिल जाए मुझको

उंगलियों उंगलियों से गुफ्तगू में मसरूफ रहे
हथेली उसकी.. मेरी हथेली मिल जाए मुझको

मैं भी जानू कनखियों से आंख मिचोली का मजा
आँखों आँखों में भी कभी वो, मिल जाए मुझको

वो कभी पलके उठा, एक नजर जो फेंक दे इधर
दोनों जहा यूँ ही... खैरात में मिल जाए मुझको

वस्ल तो रहा... ऐसे ही बस ख्वाब-ओ-ख्याल बनकर
हकीकत में दूर... बहुत दूर तक न वो मिल पाए मुझको

दिल मेरा नादान ऐसे उनकी बातें कर बहलाए मुझको
कि अब तन्हाई हैं फकत... तनहाई तडपाये मुझको

....आलोक मेहता....
(c) copyright 2009.. Aalok Mehta

खैर... इतना भी, आज लिखना अच्छा लगा

एक सधी हुई रचना
हकीकत लिए कोई सपना
आज मुझे कहनी हैं

क्या चुनु विषय
और क्या छोड़ दूँ
सोच के दरिये को
किस और मोड़ दूँ

समसमायिक
मुद्दे देखू
या कल की
कोई बात कहू

बयां करू
रवानी-ऐ-इश्क
या पढू
फ़साना-ऐ-अश्क

मगर मुझमे
गाम्भीर्य नहीं
ठहराव भी नहीं,
धैर्य नहीं

लफ्जों की
समझ नहीं
जबान भी
सहज नहीं

फिर आखिर
कब, क्या,
किस तरह लिखू
किस तरह
उतारू खुद को
क्यूकर ये
तस्वीर रंचू

लाख कोशिशों
बाद भी
कहाँ कुछ लिख पाया हूँ
जज़्बात एक भी अपना
ढंग से
कहाँ कह पाया हूँ

क्या कभी था
हुनर मुझमे,
जो ख़त्म हुआ
एक बुलबुला था, पानी का
फूटा,
आँखों में नम हुआ

आज एक और बार
कोरे कागज़ से विदा लेता हूँ
ऐसा करता आज की रात
फिर ये शमा बुझा देता हूँ

आऊंगा फिर जब
जज्बातों की रवानी होगी
ख्यालो की कंगाली नहीं
पास कोई कहानी होगी

मगर क्या जरुरी हैं
की लिखने का कोई विषय,
कोई मतलब हो
वो लेखक ही क्या
जिसे किसी वजह
की तलब हो

खैर इतना भी आज
लिखना अच्छा लगा
की मैं सच में लिख पाउँगा कभी
आज फिर से ये सपना
बेहद सच्चा लगा ....


.... आलोक मेहता

उसकी 'तू' मेरी 'मैं' से बड़ी क्यूकर हो

इस तरह हवा-ऐ-तल्ख़ का जोर हुआ हैं
बस्ती-ऐ-शायर भी रंज का शोर हुआ हैं

रकीब से दुश्मनी रख क्या पाऊंगा मैं
यार से ही जब नाता कमजोर हुआ हैं

उसकी 'तू' मेरी 'मैं' से बड़ी क्यूकर हो
झूठी शान का तमाशा पुरजोर हुआ हैं

बादल की हैं गलती न सूरज ही खतावार
चाँद का आज दुश्मन... खुद चकोर हुआ हैं

रूबरू आते हैं वो.. तो झुक जाती हैं निगाहे
उनकी क्या कहे, खुद दिल ही चोर हुआ हैं

साथ जो थे "आलोक",,, थी अदब-ओ-तहजीब की जंजीरे
अब दूर जो ठहरे.. हर शिकवा खालिस मुहजोर हुआ हैं


...आलोक मेहता...

तू कुछ भी नहीं, तुझसे बुरा रहा मुझ पर ये शहर तेरा

ताउम्र रहा असर मुझ पर , दो घडी जो रहा हमसफ़र तेरा
जो भी मिला, खूब मिला तुझसे .. सितम तेरा, कहर तेरा

तेरे दर से जो ठुकराया गया, तो क्या गुजरी मुझ पर
तू कुछ भी नहीं, तुझसे बुरा रहा मुझ पर ये शहर तेरा

तेरी जिद रही.. सोने को चाँद, ओढ़ने को मिले चांदनी
अब मैं ठहरा फ़कीर... किस तरह भरता ये मेहर तेरा

तेरी कमसिनी की हद कि चांदनी भी तुझे जलाती हैं
और मैं नादान ... तकता रहा रास्ता सारी दोपहर तेरा

वास्ते "आलोक" वो उम्र बेवजह ही गुजरी..
जो न मिला उसे तन्हाई का एक पहर तेरा

... आलोक मेहता

कि होता हैं क्या इश्क.... इक नजर बता देना

चित्र
Image courtesy : weheartit.com

मुझे में नहीं बाकी कोई
शायद तुझमे बचा हो
टटोल जरा गिरह अपनी
देख कही छुपा हो

पोशीदा कही गर हो
जरा मुझसे मिला देना
होता हैं क्या इश्क
इक नजर बता देना

अरसा बीता इक
वो पल अब तक न बीता
तू नहीं गया अब तक
हर लम्हा पड़ा फीका


गर कही मिल जाए तू
पहले सा, मुझे दिखा देना
कि होता हैं क्या इश्क
इक नजर बता देना


.. आलोक मेहता...

dil se dil ka paigham likhta hu...

चित्र

nakaam jo hua, dil jarur kuch bojhil hain...

nakaam jo hua, dil jarur kuch bojhil hain...
magar safar ye ab bhi tay karne kabil hain

kya hua jo rasta bhatka, manjil jo na mili
ab to bas ye hain khyal, ki kami kya rahi

hausle jo hain to fir mujhe chalna hi hain
kuch kadam aur sahi, makam phir milna hi hain

...Aalok mehta....

उठ... , बढ़... कि... सफ़र ये पूरा कर .

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एक जंग हारा हूँ मैं... ये कहना हैं मेरे यारो का
नतीजे का अखबारों में, दीवारों पे इश्तेहारों का
जो मिलता हैं मिल कर अफ़सोस जता देता हैं
होंठो के पोरो में दबी कोई बात बता देता हैं
कहते हैं बहुत बुरा हुआ, जो ये मेरे साथ हुआ
खवाब सारे चलते गए, अरमान हर धुँआ हुआ
मेरे कुछ कहने से पहले ही नजरिये बन चुके हैं
मैं हार चुका हूँ सब अपने आप समझ चुके हैं
आँखों में मेरी कुछ उदासी जो झलक आई थी
जाने कितनी ही बातें मौजूद हर शख्स ने बनायीं थी
सुन उनकी बातें मैं कुछ कुछ खुद पर शुबा करने लगा
क्या सच में हार चुका हूँ इस सवाल से डरने लगा
आईने में पोशीदा अक्स दिखा तो कुछ तस्सली हुई
की उसकी नजरो में अब तक मेरी चमक थी बची हुई
उससे बातो के चंद सिलसिले फिर जो चले
छंट गई धुंध तमाम, ख्वाब सारे खोये मिले
उसने कहा की क्या हुआ एक हार जो मिली
सांसे अब भी चल रही, नहीं थमी ये जिंदगी
की मौका मिला हैं तुझे जो, कमर तू फिर से कस
कितना ही कहे ये जमाना, होना न तू टस से मस
सफ़र अभी ख़त्म नहीं, ख़त्म काम नहीं
विराम तो था.. मगर ये पूर्ण विराम नहीं
हारा नहीं तू यार मेरे, जब तक तू रहा हैं लड़
जीतने कि हैं कूबत तुझमे, अपना तू विश्वास कर
उठ... ,…

मैं दिल ही दिल नम रहा, शायद गुनाह हो गया

चित्र
अब क्या कहू यार की ये क्या हो गया
क्या हुई वजह जो वो बेवफा हो गया

हज़ार ही बातें मेरी... नापसंद है उसे
जाने आज किस बात वो खफा हो गया

जुदा हैं वो अब... मगर ये भी करम रहा
खामोशी खामोशी ही मैं रुसवा हो गया

वो रोया तो अश्को को पलकों पर संभाला मैंने
मैं दिल ही दिल नम रहा, शायद गुनाह हो गया

अब कोई सूरत न रही कि मिल जाऊ उस से मैं
लगता हैं आज सच में मुझसे वो जुदा हो गया

उसने मुड़कर कब देखा.. जो कोई बचा रहता
फिर मिलने का हर अरमान अब फना हो गया


... आलोक मेहता...

सारंगी

चित्र
बचपन के वो भरी दुपहरी के किस्से
वो चाँद यादें धुंदली सी
वो कुछ मेरी गुजरी कहानियो के हिस्से
वो गली में गूंजना एक सारंगी की आवाज़
वो दौड़ पड़ना माँ के पास लेकर उसे खरीदने की जिद

वो सोचना हमर गर हमे ये सारंगी मिल जाए
तो हम भी हाथो में ले उसे सबसे बेहतर बजाये

सोचा करते थे हाथ में आते ही वो खुद ही बज पड़ेगी
न होगी जरुरत की तालीम की, न कोई मेहनत लगेगी

पर जब हाथो ने उसे ले हाथ पहला तार छेदा
अंदाजा हो गया कि हैं नहीं सीधा काम हैं टेड़ा

ये तो वैसी नहीं बजती जैसा कि हमने सोचा था
कि उस के हाथो में तो इसका सुर ऐसा ना था

फिर कोशिश कर देखा तो आवाज़ बिलकुल सुरीली न थी
सारंगी वाले के साज के सामने तो वो कही ठहरती ना थी

लड़कपन ने कहा हमारे, हो न हो साज ही ख़राब हैं
लगता हैं... ये ठग हमे ही निकला लूटने, आज हैं

उसका वो साज़ तो क्या ही खूब बजता था
उंगलिया पड़े तारो पर क्या समां बंधता था

हमने कि जिद, हमे तो वही साज़ चाहिए
अपना साज हमे दे, आप हमारा बजाइए

उसका क्या था, उसने ख़ुशी ख़ुशी ऐसा ही किया
पर उंगलियों ने नए साज़ भी कोई कमाल न किया

फिर न निकली इस साज़ भी कोई सुरीली तान
नतीजा यहाँ भी.... फिर वही ढाक के तीन पात

अब हमने कहा, क्…

wo tadpa mujhe khud mein dekh kar..

चित्र
meri yad ko ek kone mein feink kar....
wo tadpa mujhe khud mein dekh kar...

khair manata raha wo ulfat se yu to...
tasveer rakhi hai ek magar sahej kar...


najre lut leti hain yuhi in raho mein...
gujariye ishq ki galio se jara dekh kar...


usko inkaar kab tha mere wade se...
badli usne baat meri hi lachari dekh kar...


patte sabhi shak ko belibaas kar gir gaye..
hairaan hain bahar kamal-e-patjhad dekh kar..

us shaks se, jis'se mujhe bachane ki umeed thi...
wohi nikla hain mujhe haath ghamo ke bech kar..


na dhimi kar e jahan mere dard par pakad...
thoda aur jor laga, julm kuch aur tej kar...


...Alok Mehta...

मैं चल पड़ता हूँ उन्ही रास्तो पर अक्सर....

मैं चल पड़ता हूँ, उन्ही रास्तो पर अक्सर....
जमाना बताता जिन्हें... हौसलों की जद में नहीं


होती हैं उन्ही मंजिलो की चाह ही मुझको
कही जाती हैं जो मेरे इरादों की हद में नहीं ...

किसी के सुझाये रास्तो पर चलना कब गवारा हुआ
बनी बनायीं राहो पर चलना अपनी तो फितरत नहीं

बढ़ पड़ते हैं अनछुई मंजिलो की जानिब कदम
जो पा लिए गए उन मकामो की कोई चाहत नहीं

हौसलों से पाया जो... जिंदगी का एक कतरा बहुत हैं
खैरात में मिले तो कुछ औकात-ऐ-जन्नत नहीं

अपनी ही कारगुजारियो से यार नाम हो काफी हैं
किसी और की शौहरत जाने की कोई हसरत नहीं

वादा कब किया था की अव्वल आ ही जाऊँगा
बूँद की कोशिश कर समंदर पाने की कोई गफलत नहीं

अपने दम पर जो मिली "आलोक" वो हार भी अनमोल हैं
किसी और के भरोसे जो मिले उस जीत की कोई कीमत नहीं

...आलोक मेहता ...

आ तय कर ले फिर सलीका-ऐ-गुफ्तगू क्या रहे

क्या रही वजह की यूँ खफा रहें
फासले अपने क्यू दरमियाँ रहे

मुझे भी गर तुझसे होता गिला नहीं
तुझे भी न हो शिकवा तो कैसा रहे

दूरियां में इजाफा न हो खामखाँ
दूर जाने का फैसला.. न बेजा रहे

गर जाना हमेशा के लिए जाना
लौट आने का न कोई रास्ता रहे

मेरी आँख से अपनी तस्वीर भी तू लेता जा
कि चुभता रहे... जो कोई ख्वाब अधूरा रहे

यूँ ही अपनी दस्ताने... फिर गर टकराए कही
आ तय कर ले... फिर सलीका-ऐ-गुफ्तगू क्या रहे

चुरा भी न लेना.. नजरे, कही तू मुझको देखकर
नजरो पर देखना कही न... ये अदब बुरा रहे

हैं उसकी भी आरजू कि "आलोक" तुझसे क्या कहे
अब के अगर मिलना तो अपना होने का न शुबा रहे


....आलोक मेहता...

गुफ्तगू जो हुई... दरिया-ऐ-उल्फत उफान आया

कल एक मुद्दत के बाद उसका पैगाम आया उस हसी के लबो पर, बलफ्ज़ मेरा नाम आया
दोनों जानिब 'चुप' जो रहती तो किस तरह बढती गुफ्तगू जो हुई... दरिया-ऐ-उल्फत उफान आया
खैर यूँ भी रही.. कि, रुख पर पर्दा बराबर गिरा रहा वरना यहाँ उनकी झलक दिखी.. यहाँ तूफ़ान आया
हमसफ़र मेरे सफ़र के... यूँ तो वही रहे, फिर भी सब चेहरे बदल गए कि ऐसा भी एक मकाम आया
खुशियों कि जागीर उनकी भी किस्मत थी, लेकिन ... जाने क्यू हिस्से आशिकों के.. दर्द-ओ-ग़म तमाम आया
नाकाम आशिको का.. किसी बज्म जब कभी, जिक्र छिड़ा हैरां रहा "आलोक"... फेरहिस्त जब रकीब का भी नाम आया
... आलोक मेहता....

फासले रिश्तो के... एक कदम से मीलो बढ़ते हैं

चित्र
वो अब धीमी आग सा मुझ में सुलग रहा हैं
पास नहीं आता.. दूर भी जाने से बच रहा हैं

बातो के सिलसिले तो उस शख्स से कभी न थे
दस्तूर-ऐ-दुआओसलाम एक उम्र तलक रहा हैं

करीब आ जाए, तो दूरियां बढ़ जायेंगी शायद
मुझे सुकून हैं, मुझसे बेहद दूर वो शख्स रहा हैं

फासले रिश्तो के... एक कदम से मीलो बढ़ते हैं
अदब इनमे पैमाना-ऐ-दूरी का बेहद तल्ख़ रहा हैं

कोई बतला दे उसे फासलों में लफ्जों का मतलब जुदा हैं
जब हम कहे चले जाओ... तब पास रहना चलन रहा हैं

बूंदे जो कुछ ठहरी थी... उसकी पलकों कि कोरो में
"आलोक" तेरी आँख भी कुछ उनसा झलक रहा हैं


.... आलोक मेहता...

फासले ये अब कम न होंगे.. और ये गहराएंगे..

चित्र
उसके गुरुर, मेरे अहं से कहाँ आगे बढ़ पाएंगे.... फासले ये अब कम न होंगे.. और ये गहराएंगे..
... आलोक मेहता...

हसी एक ख्वाब पनाह-ऐ-नजर रखता हूँ

चित्र
हसी एक ख्वाब पनाह-ऐ-नजर रखता हूँ
निगाह तेरे रुख का हसी मंजर रखता हूँ

तुझे नहीं ख्याल कि तेरी मुझे फ़िक्र हैं
तुझसे से बढकर मैं तेरी खबर रखता हूँ

ऐ यार हसी, तेरी... फकत आरजू मुझको
तेरी ही जुस्तजू मैं शामो-सहर रखता हूँ

ख्यालो कि जद में तेरी चाहे बसर न हो
रूह पर तेरी मगर ऐ हसी पकड़ रखता हूँ

कूबत हैं कि "आलोक" जग से छीन ले तुझको
तू खुद अपनाएगी मुझको, सोच सब्र रखता हूँ


...आलोक मेहता....

शिखर पर हो या निचला ही पायदान हो कोई कितना ही

मैं भी कह सकता था औरो सा, की मुझे इल्म नहीं मुझ पर हुआ हैं जो वो, उससे बड़ा कोई सितम नहीं कि मेरा नहीं कोई कसूर सब किस्मत का किया हैं हार चाहे हुई मेरी, मगर मैं खतावार हरदम नहीं
मगर किस सूरत ऐसा यारो बोलो मैं यह झूठ कह देता आईने में जो शख्स हैं भला उसे कैसे ये जिरह देता कि दुनिया को नहीं मैंने खुद को जो समझाना था अपनी ही रूह को धोखा मैं यारो किस तरह देता
इतने इम्तिहानो के बात फकत एक बात मैं जानी हैं हार हो.... या जीत मेरी हस्ती तो न बदल जानी हैं "आलोक" हर हाल, यार.... शख्स वही रहना हैं गर हार में बेहतर नहीं, सूरत जीत में भी वही रह जानी हैं
इन फिजूल फलसफो पर अब तो ये जिंदगी न चलेगी कोशिश तो भरपूर होगी मगर नतीजे से हस्ती न बदलेगी शिखर पर हो या निचला ही पायदान हो कोई कितना ही गर शिद्दत पूरी होगी मेरी तो चेहरे पर यही हसी बिखरेगी
.... आलोक मेहता ...

कचहरी मुझ बेगुनाह की "आलोक" जब लगायी गयी

तफ्तीश मेरे कत्ल की यार जिस रात पूरी हुई... और एक जान गयी, कत्ल-ए-सच जिसे कहा गया
सबूत सारे ही जाने क्या हुए, कहाँ सब गवाह गए एक हारा हुआ मसला था, यूँ ही जिसे लड़ा गया

कचहरी मुझ बेगुनाह की "आलोक" जब लगायी गयी मौजूद हर शख्स का गुनाह मेरे ही सर जड़ा गया

आलोक मेहता.

खुदा पसोपेश में था, गमो की रात किसको दे

खुदा पसोपेश में था, गमो की रात किसको दे
मैं बोल पड़ा तू मेरे सिवा ये सौगात किसको दे

एक फकत मुझ में ही रही होगी हिम्मत कि झेल जाऊ
वरना सह जाए इतने गम, खुदा इतनी औकात किसको दे

वहां जहाँ हर सिफ़्त हैं गरूर दौलत-ओ-शौहरत का
उस बस्ती ये दीवाना सदा-ए-जज़्बात किसको दे

इस हुजूम में शामिल हर शख्स से कुछ शिकवा हैं
अब इस महफिल-ए-यार में, इतने इल्जामत किसको दे

जाने किसके समझाने का उस काफिर पर हुआ असर
सजदा जो किया उसने, सेहरा-ए-करामत किसको दे

कोई भी अजनबी पहले सा खुल कर क्यों नहीं मिलता
इल्जाम-ए-तबदीली इस नयी फिजा-ए-हालत किसको दे

आलोक मेहता f