मंगलवार, 25 अगस्त 2009

वो, जो हसी.. एक गजल सी, मिल जाए मुझको

गुंजाइश कहाँ कि, अब वो मिल जाए मुझको
कि तन्हाई हैं फकत... तनहाई तडपाये मुझको

ऐ खुदा, कहते हैं मांगो तो खाली नहीं जाती
ऐसी एक दुआ तेरे दर से मिल जाए मुझको

जिस तरह उसकी आँखें रजामंद दिखती हैं
लबो कि वैसी ही मंजूरी मिल जाए मुझको

उसके हसने रोने से चलती हैं महफिले शायरों की
वो जो हसी एक गजल सी, मिल जाए मुझको

उंगलियों उंगलियों से गुफ्तगू में मसरूफ रहे
हथेली उसकी.. मेरी हथेली मिल जाए मुझको

मैं भी जानू कनखियों से आंख मिचोली का मजा
आँखों आँखों में भी कभी वो, मिल जाए मुझको

वो कभी पलके उठा, एक नजर जो फेंक दे इधर
दोनों जहा यूँ ही... खैरात में मिल जाए मुझको

वस्ल तो रहा... ऐसे ही बस ख्वाब-ओ-ख्याल बनकर
हकीकत में दूर... बहुत दूर तक न वो मिल पाए मुझको

दिल मेरा नादान ऐसे उनकी बातें कर बहलाए मुझको
कि अब तन्हाई हैं फकत... तनहाई तडपाये मुझको

....आलोक मेहता....

(c) copyright 2009.. Aalok Mehta

1 टिप्पणी:

  1. pehle sher yaani matle se kaafiya tay hota hai...

    Yahan kaafiya bana, aaye mujhko..

    par baaki saare shero.n me.n radeef ban gaya, "Mil jaye mujhko"

    Is liye, gazal ke kuchh niyam toDne ki wajeh se khoobsoorati jati rahi..

    anyways, i have not read rest of the shers. :)

    उत्तर देंहटाएं