बुधवार, 19 अगस्त 2009

तू कुछ भी नहीं, तुझसे बुरा रहा मुझ पर ये शहर तेरा


ताउम्र रहा असर मुझ पर , दो घडी जो रहा हमसफ़र तेरा
जो भी मिला, खूब मिला तुझसे .. सितम तेरा, कहर तेरा

तेरे दर से जो ठुकराया गया, तो क्या गुजरी मुझ पर
तू कुछ भी नहीं, तुझसे बुरा रहा मुझ पर ये शहर तेरा

तेरी जिद रही.. सोने को चाँद, ओढ़ने को मिले चांदनी
अब मैं ठहरा फ़कीर... किस तरह भरता ये मेहर तेरा

तेरी कमसिनी की हद कि चांदनी भी तुझे जलाती हैं
और मैं नादान ... तकता रहा रास्ता सारी दोपहर तेरा

वास्ते "आलोक" वो उम्र बेवजह ही गुजरी..
जो न मिला उसे तन्हाई का एक पहर तेरा

... आलोक मेहता

3 टिप्‍पणियां:

  1. bahut badhiya bhai ...

    kamaal ...

    pehle sher to ek dum rooh main utar gaya ..

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  2. aalok bhai,

    Achha likhaa hai,

    Ye batao, ye star vaala funda kaise lagaya...
    mujhe achha laga, its easier for reader to give rating, if someone do not wants to comment....

    Please do tell me by e-mail

    yogesh249@gmail.com

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