मंगलवार, 11 अगस्त 2009

आ तय कर ले फिर सलीका-ऐ-गुफ्तगू क्या रहे

क्या रही वजह की यूँ खफा रहें
फासले अपने क्यू दरमियाँ रहे

मुझे भी गर तुझसे होता गिला नहीं
तुझे भी न हो शिकवा तो कैसा रहे

दूरियां में इजाफा न हो खामखाँ
दूर जाने का फैसला.. न बेजा रहे

गर जाना हमेशा के लिए जाना
लौट आने का न कोई रास्ता रहे

मेरी आँख से अपनी तस्वीर भी तू लेता जा
कि चुभता रहे... जो कोई ख्वाब अधूरा रहे

यूँ ही अपनी दस्ताने... फिर गर टकराए कही
आ तय कर ले... फिर सलीका-ऐ-गुफ्तगू क्या रहे

चुरा भी न लेना.. नजरे, कही तू मुझको देखकर
नजरो पर देखना कही न... ये अदब बुरा रहे

हैं उसकी भी आरजू कि "आलोक" तुझसे क्या कहे
अब के अगर मिलना तो अपना होने का न शुबा रहे


....आलोक मेहता...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें