शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

फासले रिश्तो के... एक कदम से मीलो बढ़ते हैं


वो अब धीमी आग सा मुझ में सुलग रहा हैं
पास नहीं आता.. दूर भी जाने से बच रहा हैं

बातो के सिलसिले तो उस शख्स से कभी न थे
दस्तूर-ऐ-दुआओसलाम एक उम्र तलक रहा हैं

करीब आ जाए, तो दूरियां बढ़ जायेंगी शायद
मुझे सुकून हैं, मुझसे बेहद दूर वो शख्स रहा हैं

फासले रिश्तो के... एक कदम से मीलो बढ़ते हैं
अदब इनमे पैमाना-ऐ-दूरी का बेहद तल्ख़ रहा हैं

कोई बतला दे उसे फासलों में लफ्जों का मतलब जुदा हैं
जब हम कहे चले जाओ... तब पास रहना चलन रहा हैं

बूंदे जो कुछ ठहरी थी... उसकी पलकों कि कोरो में
"आलोक" तेरी आँख भी कुछ उनसा झलक रहा हैं


.... आलोक मेहता...

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