सोमवार, 3 अगस्त 2009

खुदा पसोपेश में था, गमो की रात किसको दे

खुदा पसोपेश में था, गमो की रात किसको दे
मैं बोल पड़ा तू मेरे सिवा ये सौगात किसको दे

एक फकत मुझ में ही रही होगी हिम्मत कि झेल जाऊ
वरना सह जाए इतने गम, खुदा इतनी औकात किसको दे

वहां जहाँ हर सिफ़्त हैं गरूर दौलत-ओ-शौहरत का
उस बस्ती ये दीवाना सदा-ए-जज़्बात किसको दे

इस हुजूम में शामिल हर शख्स से कुछ शिकवा हैं
अब इस महफिल-ए-यार में, इतने इल्जामत किसको दे

जाने किसके समझाने का उस काफिर पर हुआ असर
सजदा जो किया उसने, सेहरा-ए-करामत किसको दे

कोई भी अजनबी पहले सा खुल कर क्यों नहीं मिलता
इल्जाम-ए-तबदीली इस नयी फिजा-ए-हालत किसको दे

आलोक मेहता
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