बुधवार, 12 अगस्त 2009

सारंगी


बचपन के वो भरी दुपहरी के किस्से
वो चाँद यादें धुंदली सी
वो कुछ मेरी गुजरी कहानियो के हिस्से
वो गली में गूंजना एक सारंगी की आवाज़
वो दौड़ पड़ना माँ के पास लेकर उसे खरीदने की जिद

वो सोचना हमर गर हमे ये सारंगी मिल जाए
तो हम भी हाथो में ले उसे सबसे बेहतर बजाये

सोचा करते थे हाथ में आते ही वो खुद ही बज पड़ेगी
न होगी जरुरत की तालीम की, न कोई मेहनत लगेगी

पर जब हाथो ने उसे ले हाथ पहला तार छेदा
अंदाजा हो गया कि हैं नहीं सीधा काम हैं टेड़ा

ये तो वैसी नहीं बजती जैसा कि हमने सोचा था
कि उस के हाथो में तो इसका सुर ऐसा ना था

फिर कोशिश कर देखा तो आवाज़ बिलकुल सुरीली न थी
सारंगी वाले के साज के सामने तो वो कही ठहरती ना थी

लड़कपन ने कहा हमारे, हो न हो साज ही ख़राब हैं
लगता हैं... ये ठग हमे ही निकला लूटने, आज हैं

उसका वो साज़ तो क्या ही खूब बजता था
उंगलिया पड़े तारो पर क्या समां बंधता था

हमने कि जिद, हमे तो वही साज़ चाहिए
अपना साज हमे दे, आप हमारा बजाइए

उसका क्या था, उसने ख़ुशी ख़ुशी ऐसा ही किया
पर उंगलियों ने नए साज़ भी कोई कमाल न किया

फिर न निकली इस साज़ भी कोई सुरीली तान
नतीजा यहाँ भी.... फिर वही ढाक के तीन पात

अब हमने कहा, क्या हैं पहेली जरा हमे समझाना
कहा सारंगी वाले से, "भैया, ये हुनर हमे सिखलाना"

भैया बोले.. "मैंने भी कोई यूँ ही नहीं ये फ़न पा लिया था"
"अपने दिन रात इसे सीखने कि खातिर फर्क न किया था"

पहले पहल तो ख्याल मुझे भी यही आया था..
हुनर इसका हैं, जो हैं इस साज़ ने ही बजाया था...

लेकिन असल में हुनर तो बजाने वाले में होता हैं
साज़ तो सुर सजाने का महज एक जरिया होता हैं

सारंगी वाले की इस बात से एक अहम् बात मैंने जानी थी
जो जिंदगी ने कही आगे जाकर मुझे फिर सिखलानी थी

जिंदगी भी तो ये एक साज़ ही हैं, जैसे बजाओ बजे चली जाती हैं
ख़ुशी के तराने छेड़े, या गम कि ताने, फैसला हम पर छोड़े जाती हैं

अब क्या बजता हैं ये सिर्फ हमारे हुनर पर मुनस्सर हैं
कल हो या आज किसी और से नहीं, हमसे ही बेहतर हैं

तो आओ अपनी अपनी सारंगियों पर, नए कुछ राग छेड़े ...
ग़म, नफरत, हिंसा को छोड़, प्यार के हर सू.. सुर बिखेरे

....आलोक मेहता...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें