हसी एक ख्वाब पनाह-ऐ-नजर रखता हूँ


हसी एक ख्वाब पनाह-ऐ-नजर रखता हूँ
निगाह तेरे रुख का हसी मंजर रखता हूँ

तुझे नहीं ख्याल कि तेरी मुझे फ़िक्र हैं
तुझसे से बढकर मैं तेरी खबर रखता हूँ

ऐ यार हसी, तेरी... फकत आरजू मुझको

तेरी ही जुस्तजू मैं शामो-सहर रखता हूँ

ख्यालो कि जद में तेरी चाहे बसर न हो
रूह पर तेरी मगर ऐ हसी पकड़ रखता हूँ

कूबत हैं कि "आलोक" जग से छीन ले तुझको
तू खुद अपनाएगी मुझको, सोच सब्र रखता हूँ


...आलोक मेहता....

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बात चुभती हो कोई... तो चलो बात करे...

कि ये खता... मेरी न थी...