शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

हसी एक ख्वाब पनाह-ऐ-नजर रखता हूँ


हसी एक ख्वाब पनाह-ऐ-नजर रखता हूँ
निगाह तेरे रुख का हसी मंजर रखता हूँ

तुझे नहीं ख्याल कि तेरी मुझे फ़िक्र हैं
तुझसे से बढकर मैं तेरी खबर रखता हूँ

ऐ यार हसी, तेरी... फकत आरजू मुझको

तेरी ही जुस्तजू मैं शामो-सहर रखता हूँ

ख्यालो कि जद में तेरी चाहे बसर न हो
रूह पर तेरी मगर ऐ हसी पकड़ रखता हूँ

कूबत हैं कि "आलोक" जग से छीन ले तुझको
तू खुद अपनाएगी मुझको, सोच सब्र रखता हूँ


...आलोक मेहता....

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