सोमवार, 3 अगस्त 2009

कचहरी मुझ बेगुनाह की "आलोक" जब लगायी गयी

तफ्तीश मेरे कत्ल की यार जिस रात पूरी हुई...
और एक जान गयी, कत्ल-ए-सच जिसे कहा गया

सबूत सारे ही जाने क्या हुए, कहाँ सब गवाह गए
एक हारा हुआ मसला था, यूँ ही जिसे लड़ा गया


कचहरी मुझ बेगुनाह की "आलोक" जब लगायी गयी
मौजूद हर शख्स का गुनाह मेरे ही सर जड़ा गया


आलोक मेहता.

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