सोमवार, 3 जनवरी 2011

दुनियादारी उससे भी हम इस कदर निभा लेते हैं... ...

दुनियादारी उससे भी हम इस कदर निभा लेते हैं... ...
उसके काँधे पे सर रख.. कद अपना... बढ़ा लेते हैं...

नाउमीदी की जंजीरे फलक जो मेरा निगल जाए...
यादो की परवाज़ लगा हम आसमा अपना... बढ़ा लेते हैं...

यूँ ही कहा हो पाती हैं... रूह की ये सरगोशियाँ
इसरार उनका होता हैं..तो कुछ हम भी.. फरमा लेते हैं

दीवारों की फ़िक्र कहा.. जितनी ही दरमियाँ निकले....
दरवाजा गर न बन पाए... हम रोशनदान... बना लेते हैं...

अपने ग़म को फुर्सत कुछ यूँ भी नहीं मिल पाती हैं...
वो जो हसने लगते हैं ..तो फिर हम भी मुस्कुरा लेते हैं...

हमसे नहीं तो किससे हो... उल्फत का फिर सिलसिला ...
आलोक हमी से बिगड़ते हैं.. हमी से फिर बना लेते हैं...


...आलोक मेहता...



duniaadaari us'se bhi hum is kadar nibha lete hain...
uske kaandhe pe sar rakh... kad apna.. badha lete hain...


naumeedi ki janjeere kabhi falak jo mera nigal jaaye...
yaado ki parwaaz laga.. hum assama apna.. badha lete hain..


yu hi kaha ho paati hain.. ruh ki ye sargoshiyaa...
israar unka hota hain.. to kuch hum bhi farmaa lete hain...


diwaaro ki fikr kahan.. kitni hi darmiyaa nikle...
darwaaja gar na ban paaye.. hum roshandaan bana lete hain...


apne gham ko fursat kuch yu bhi nahi mil paati hain...
wo jo hasne lagte hain.. to phir hum bhi muskura lete hain...


humse nahi to kis'se ho.. unki ulfat ka phir silsila...
"aalok" humi se bigate hain.. phir humi se bana lete hain...


...aalok mehta....

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