बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कभी बेधड़क दिल में घुस आये थे मेरे...

वो जो करते हैं अब.. हर बात का तकल्लुफ...
कभी बेधड़क दिल में घुस आये थे मेरे...

आलोक मेहता...

4 टिप्‍पणियां:

  1. अल्फ़ाज़ोँ का ज़हीन होना आपकी लेखनी की सबसे बड़ी खासियत है जो आपकी शायरी को और भी ज्यादा खूबसूरत बना देती है बिल्कुल इस शायरी की तरह।

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  2. इतने अच्छे लफ्जों के लिए बेहद बेहद शुक्रिया स्नेहा...

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  3. Bahut sundar rachana hai:)

    Following you now.. Glad I discovered your blog:)

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  4. Behad shukriya Sonia ji... Thanks a lot for the words of appreciation and the pleasure is all mine.. :)

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