सोमवार, 23 अप्रैल 2012

लम्हा जो भी गुजरा.. बेहद खूब गुजरा....

वक़्त गुजरा भी तो क्या खूब गुजरा...
कर सारे ही ख्वाब मंसूब गुजरा....

और क्या कहे क्या रही सोहबत तुम्हारी....
लम्हा जो भी गुजरा.. बेहद खूब गुजरा....

आलोक मेहता...

5 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद मुश्किल क़ाफ़िये पर काबिल-ए-तारीफ़ अल्फ़ाज़...! Hamesha ki tarah behtareen!

    "मैँ सजदे मेँ बैठी हूँ आज भी वहाँ पर
    जिन रास्तोँ से होकर मेरा महबूब गुजरा"

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