मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो...





मैं ही बदल जाऊँगा... अमां क्या कहती हो ...
नए रंग ढल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो.....

खुद से मिलते तो.. बनता नहीं कभी...
उससे मिलने कल जाऊंगा... अमां क्या कहती हो...

उसकी थी आरजू.. जूनून भी था? क्या कभी?
बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो...

शाम का चूल्हा जलाता हैं यूँ भी हर रोज मुझे...
धूप से मैं जल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो...

कई बरस गुजरे.. मेरा सावन यूँ ही पुरजोर हैं....
इस रिमझिम से गल जाऊंगा..अमां क्या कहती हो...

गोया एक तनहा ही तो नहीं मैं रंज-ओ-ग़म का मारा....
फिर मैं ही ऐसे मर जाऊंगा... अमां क्या कहती हो...

आलोक मेहता...

12 टिप्‍पणियां:

  1. आज भी अम्मा ...
    बाट जोहती हैं उस रस्ते कि
    जिस से ,उसका लाडला गया था ,
    चूल्हा आज भी जलता हैं ,
    बुझ जाने को
    पर रोटियां नहीं सिकती
    अपने अकेले के लिए ,
    मन से दुआ आज भी
    निकलती हैं ...
    हाथ अब भी उठते हैं आशीष के लिए
    पर वो सर नहीं दिखता |.....अनु

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बुधवारीय चर्चा-मंच
    पर है |

    charchamanch.blogspot.com

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  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. गोया एक तनहा ही तो नहीं मैं रंज-ओ-ग़म का मारा....
    फिर मैं ही ऐसे मर जाऊंगा... अमां क्या कहती हो...अमां जो भी कहा अच्छा कहा

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    1. बेहद शुक्रिया.. रश्मि प्रभा जी...

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  5. बेहद शुर्किया.. क्षितिजा जी....

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