बुधवार, 2 दिसंबर 2009

....तो खुद को बदल देता

बदल जो सकता गर कुछ
तो खुद को बदल देता
तोड़ पुराने बंध खुद को
नए सांचो में ढल देता
भुला देता तजुर्बे हार के
बिसरा देता जीत की कहानी
'कल' मेरा वजूद न रखता
न होती कोई बात जानी पहचानी
सोच की दायरे भी असीमित होते
ख्यालो की भी कोई सीमा न होती
फिर मुझमे दुनियादारी न होती
इस पतन में मेरी हिस्सेदारी न होती
किसी की मदद से कतराता भी नहीं
राह में देख अजनबी घबराता भी नहीं
बीते दिनों का कुछ गिला न होता
ख्वाब टूटा आँखों में सीला न होता
तुझे पर भी कुछ भरोसा रहता
उम्मीदों की थाली में तेरा बोसा रहता
कितना ही होता अच्छा
गर सब ये बदल देता
तोड़ पुराने बांध सभी
खुद को नए सांचे में ढल देता
... आलोक मेहता..

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