सोमवार, 13 अक्तूबर 2008

इश्क करने को यारो, मेरे घर... हालात नहीं मिलते .





ख्यालात नहीं मिलते.. उससे मेरे जज़्बात नहीं मिलते
इश्क करने को यारो, मेरे घर... हालात नहीं मिलते


दिन नहीं मिलते तो कभी हमे रात नहीं मिलते
चाँद पल उससे हमे मुलाक़ात नहीं मिलते...


जाम नहीं मिलते कभी कोई शाम नहीं मिलती
उसकी भी जिंदगी अब मुझे मेरे नाम नहीं मिलती

रंग नहीं मिलते की अब वो ढंग नहीं मिलते
इश्क में फ़ना हो.. अब वो मलंग नहीं मिलते

हम नहीं मिलते यहाँ और अब तुम नहीं मिलते
एक दूजे के ख्यालो में अब हम गुम नहीं मिलते...

करामात नहीं मिलती.. कोई तेरी कायनात नहीं मिलती...
ऐ-खुदा तेरे जहाँ मुझे.. जान-ऐ-हयात नहीं मिलती...


आलोक मेहता...






khayalat nahi milte, us'se mere jasbaat nahi milte...
ishq karne ko yaaro mere ghar haalat nahi milte...

din nahi milte kabhi hume raat nahi milte..
chand pal us'se mujhe mulaakat nahi milte....

jaam nahi milte mujhe koi shaam nai milti...
uski jindagi bhi ab mujhe mere naam nahi milti...


rang nahi milte ab mujhe wo dhang nahi milte...
ishq mein jo fana ho, ab wo malang nahi milte...


hum nahi milte yaha aur yaha ab tum nahi milte...
ab ek duje ke khyalo mein hum gumsum nahi milte

aur karaamat nahi milti, ki teri kaaynaat nahi milti...
e khuda tere jahan mein mujhe jan-e-hayat nahi milti...

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