शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

परवाज उसे ही मिलती हैं जो कटी पतंग बदलता हैं

कुछ लोग जब मिलते हैं तो मौसम रंग बदलता हैं
सूरज पश्चिम से निकलता हैं अपने ढंग बदलता हैं

दिशाए बदल जाती हैं एक मोड़ से इन राहो की
सफ़र बदल जाता हैं जब राही "संग" बदलता हैं

भूख लाचारी के मुद्दे तज जब फिजूल बातें करते हैं
देश बदल जाते हैं जब हुक्मरान जंग बदलता हैं

सपनो के फुग्गे* फूटे जो ऐ दिल तू उनका मोह न कर
परवाज उसे ही मिलती हैं जो कटी पतंग बदलता हैं

सोने चांदी में न तोल बंदगी खुदा की "आलोक"
प्यार की निगाह एक पर, वो मलंग बदलता हैं

... आलोक मेहता..


*फुग्गे = गुब्बारे

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