शुक्रवार, 5 मार्च 2010

हूँ नहीं हासिल तुझे...मजबूर हूँ मैं

तेरी खातिर तुझसे अब दूर हूँ मैं...
हूँ नहीं हासिल तुझे...मजबूर हूँ मैं

मैं नहीं कि... तेरी तकदीर कोई और हैं...
दो दिन जो न ठहरा... वो फितूर हूँ मैं

दोस्ती यू ही रहती ख्वाबो सी तो बुरा क्या था
इश्क जताकर तो अब तेरा दुश्मन मशहूर हूँ मैं

फकत वो कहा... जो सुनना तेरी ख्वाहिश थी ...
तुझी पर हैं इल्जाम.. अब तेरा ही कसूर हूँ मैं

जेहन-ओ-दिल से दूर रह कि तकलीफ बेहद होती हैं...
यादो की हवा न दे... दुखता हूँ कि अब नासूर हूँ मैं

तेरी अब भी आरजू कि दोस्त बन ही रह जाए हम ...
तू संभल चुकी हैं मगर होश से अब भी कोसो दूर हूँ मैं

तो क्या हुआ कि जो तू न मिल पायी मुझे...
तू कभी थी मेरी... ये सोच बेहद मगरूर हूँ मैं...

पहली बार नहीं "आलोक" नाकाम हुआ हो उल्फत में
इश्क नहीं हैं यार फितरत में...इस खेल बेशःउर हूँ मैं


...आलोक मेहता...



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teri khatir tujhse ab dur hu main
hun nahi haasil tujhe... majboor hun main

main nahi ki.. teri takdeer koi aur hain
do din jo na tehrat.. wo fitoor hun main

dosti yu hi rehti khwabo si to bura kya tha
ishq jatakar to ab tera dushman mashoor hu main

maine fakat wo kaha.. jo sun'na teri khwahish thi...
tujhi par hain ki iljaam.. ab tera hi kasoor hu main

jehan-o-dil se dur reh ki takleef behad hoti hain
yaado ki hawa na de.. dukhta hu ki ab naasoor hun main

teri ab bhi aarjo ki dost ban hi reh jaaye hum..
tu sambahl chuki hain magar hose se koso dur hun main...

to kya hua ki... jo tu na mil paayi mujhe...
tu kabhi thi meri.. ye soch behad magroor hu main

pehli baar nahi "Aalok" naakam hua ho ulfat mein
ishq nahi yaar fitrat mein.. is khel be'shaur hu main

...aalok mehta....

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