सोमवार, 26 अप्रैल 2010

जो भी हुआ हो बुरा इस जिंदगी मेरी ...तुझ पर कोई इल्जाम मेरा नहीं...

सारा जहाँ कहने को तेरी ही पनाह...घर ये तेरा सही
ऐ खुदा.... तू गर हैं भी तो.. तुझसे वास्ता मेरा नहीं...

न करम से तेरे कोई वास्ता... न तेरे कोई कहर का ही खौफ....
मेरी हार हो मेरी हार... जीत में मेरी कोई साझा तेरा नहीं ....

गर नेमते हैं तेरे बस में अता करना..तो जरुरतमंदो को दे देना तू....
मैं खुश अपने हौसलों के चलते.... करना कभी मुझसे इसे जुदा नहीं...

न कभी देखा तुझे.... न कोई वस्ल का कोई राफ्ता ही हुआ....
सारा जहाँ माना किया तुझे.... कहा तू ये किसी को पता नहीं....

अपनी सहूलियतो के लिए...तेरे दर पे तेरा कारोबार होता हैं...
गर सारा जहाँ चलता तेरे दम पे....क्यों तू इससे बचा नहीं...

मजलूमों पे जुल्म होते हैं... तेरे ही ठेकेदारों के हाथो... तेरे ही नाम के चलते....
तू बन गया अब फकत अमीरों का.... मुफलिसी में शायद तेरा बसर अब रहा नहीं...

फिर भी आलोक को नहीं मंजूर... दुनिया की तरह तुझ पर ही लगा दे वो....
जो भी हुआ हो बुरा इस जिंदगी मेरी ...तुझ पर कोई इल्जाम मेरा नहीं...

....आलोक मेहता...

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