शनिवार, 28 अगस्त 2010

दर्द बाँट उन का.. कभी उनमे ठहर भी ....


सर्द रातो का हैं तजुर्बा, कि झेली तपती दोपहर भी...
इन लोगो में देखी हैं इन आँखों ने क़यामत की सहर भी ...

हर तरफ से मायूस मेहनतकश मेरे मुल्क के हो चले
गावो में गर हैं सूखा तो शहरो में बारिश का कहर भी ....

नाउम्मीदी में सोचा कई दफा... के, मर जाऊ मैं...
फिर तोड़ी हैं रस्सियाँ खुद ही.. फेंका हैं जहर भी ...

खाली बातें ही न हुई हुक्मरानों की महफ़िल में...
फूटी हैं फिर सरकारी चट्टानों से.. वादों की लहर भी ...

मेरी तरफ देख मेरी जमी एक नजर मांग उठती हैं...
मैं मसरूफ अपने ख्वाबो में .. भरता नहीं, ये मेहर भी...

अपने पेट की खातिर खेती छोड़ तेरी मजदूरी करते हैं....
यु ही चला तो मुझसा.... भूख से तडपेगा तेरा...ये शहर भी....

कहता तो बहुत हैं.. "आलोक" कभी कुछ कर भी जा...
कुछ न सही दर्द बाँट उन का.. कभी उनमे ठहर भी ....


आलोक मेहता

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