शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

पलकों के किवाड़...

एक अरसे बाद
सांझ ढलते ही .
दिल फिर से
बेचैन होने लगा हैं...
कभी इधर
कभी उधर
घबरा कर
देखता हैं...
हवाओं के संग
खिड़की से
एक साए की
आहट आती हैं...
करीने से बिछाए
गयी यादो की चादर
मेरे जेहन की सिलवटो
को तरसती हैं...
मगर थके हार कदम
तन्हाई के बिस्तर को
जाते ठिटक उठते हैं ...
मैं थक कर कुर्सी पर
बैठ जाता हूँ
बोझिल पलके
खुली रहने को
संघर्षरत हैं.. ..
बीते पलो
की झपकी लगते ही
हडबडाकर
जाग उठता हु....
आज फिर से
कोई ख्वाब में
आने वाला हैं..
कि एक अरसे बाद
आज फिर कोई
पलकों के
किवाड़ खटखटाता हैं...


आलोक मेहता...

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