शनिवार, 24 सितंबर 2011

खो जाए तो फिर हासिल... ये सौगात नहीं होती


[image courtesy : google images]


खो जाए तो फिर हासिल... ये सौगात नहीं होती
इश्क अंजाम को आए तो फिर शुरुआत नहीं होती...

कभी होती थी सिर्फ एक उसकी ही बात...
अब बस एक उसकी ही बात नहीं होती...

सामने पड़ जाए तो राहे मैं बदल दूँ...
चंद कदम भी अब वो साथ नहीं होती...

बारहा नाकाम हैं कोशिशे दूर रहने की.
नहीं कोई मोड़..जहा मुलाक़ात नहीं होती...

मिल गया कोई.. कोई फिर हैं साथ उसके...
पहले सी मोहब्बत हासिल हजरात नहीं होती..

आलोक उल्फत गयी..मगर कोई तो खुश हैं....
मुझ सी सिसकती उसकी कोई रात नहीं होती...

..आलोक मेहता...

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