शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

तेरी मेरी का फर्क नहीं...हर जिंदगानी मेरी हैं....

हर शख्स से मेरे यार यहाँ.. निभ जानी मेरी हैं...
तेरी मेरी का फर्क नहीं...हर जिंदगानी मेरी हैं....

बात जो सताती हो... लाख तेरी सही.. मगर
बल जिसपे ठहरे हैं... वो पेशानी मेरी हैं...

वो कि जिसका.. हर एक किरदार ही हैं... नायक
मैं खुद खलनायक जिसमे ...वो कहानी मेरी हैं...

कितने ही धोखे खाता रहा.. उफ़ न की मगर...
कब संभलेगा दिल बता .. ये हैरानी मेरी हैं.

मैं लौट आया दरवाजे से ... उससे फिर मिले बगैर...
जिस शख्स से एक उम्र से पहचान पुरानी मेरी हैं..

'आलोक' वो बदल जाये.. तू तो तू ही रहना...
बाकी जो, लुट जाये... बच जाये जो निशानी मेरी है...

आलोक मेहता..

08.10.2011 8.30 p.m.

2 टिप्‍पणियां:

  1. तेरी मेरी की उलझन से ही ज़िंदगी दुशवार है ज़माने की...अच्छी ग़ज़ल पर बीच बीच में अंग्रेज़ी मे लिखे शब्दों से प्रवाह बाधित होता है लिहाज़ा अंग्रेज़ी की ख़ास ज़रूर्त नहीं थी इस मुक़म्मल ग़ज़ल को......

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  2. शुक्रिया अली शोएब सैय्यद साहब...

    वो नेट कनेक्शन स्लो होने की वजह से कुछ शब्द हिंदी फॉण्ट में नहीं बदल पाए...इसी वजह से इस शिकायत का मौका मिला ... अब यह त्रुटी ठीक कर दी हैं..... ध्यान दिलाने के लिए आभारी हूँ...

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