सोमवार, 2 जुलाई 2012

बारहां खुद तड़पता हैं.. मुझको तड़पाता हैं...




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करवटों में गुजरती हैं रातें अब अपनी...
ख्वाब ये तेरा यूँ मुझको जगाता हैं...

उल्फत के हैं.. जो बादल ये बरसते...
और मन हैं कि बस भीगे जाता हैं...

जब से बाहों में बसी तेरे बदन कि गर्मी...
रूह में हैं कुछ..जो महके जाता हैं...

शिद्दत-इ-इश्क अब रोज हैं बढती...
मिले भी जो अब तू.. बस बेचैनियाँ बढाता हैं...

उम्र भर को ही हमदम पास अब आ जा
बारहां खुद तड़पता हैं.. मुझको तड़पाता हैं...

एक लिबास तेरा.. और उस पे अदायें भी...
हाल-ऐ-दिल क्या हो.. सब होश जाता हैं...

तेरी कमर के बल पे अटके अरमान जो मेरे...
उंगलियाँ जब ढूंढे.. तू खुद को खुद में छुपाता हैं...

तेरी मेरी आँखों में अब जो साझा हैं सपने...
रिश्ता हैं ये अपना... जो अब गहराता हैं....

...आलोक मेहता....

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर गज़ल...

    उम्र भर को ही हमदम पास अब आ जा
    बारहां खुद तड़पता हैं.. मुझको तड़पाता हैं...
    बहुत खूब...........

    अनु

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  2. कल 24/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. सुन्दर...
    रूमानी एहसास समेटे....

    अनु

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  4. शानदार , शानदार भावसंयोजन .आपको बहुत बधाई

    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

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  5. @ Anu ji...

    Anuji behad behad shukriya...


    @ Yashwant Mathur ji...

    Hausla afzaai ka Behad shukriya Mathur Sahab...

    @ Madan Saxena ji...

    Shukriya Saxena ji...





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  6. तेरी कमर के बल पे अटके अरमान जो मेरे...
    उंगलियाँ जब ढूंढे.. तू खुद को खुद में छुपाता हैं...
    बहुत सुन्दर गज़ल...

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  7. यकिन नहीं हमै की अब वो लोट आयैगे ।।

    हमको फिर भी उनका इंतजार करना अच्छा लगता है ।।

    हम अब उनसे नहीं बयां कर सकते की कितनी मुहबत करते है हम उन्हें ।।
    ये बात तो ओ भि जानते है कि मुझ बिन जी ना मर सकता है ।।।

    आदि आनंद (भावना)

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  8. इज़हारे बयां मोहब्बत का...
    लफ्जों मे भला कैसे होगा,
    कम पड़ जाएगी ज़िन्दगी भी...
    ये हाले बयां कैसे होगा..!!!

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