गुरुवार, 21 जुलाई 2011

कि ये खता... मेरी न थी...


तेरी निगाहों का था तकाजा
कि ये खता... मेरी न थी...
इजहार-ऐ-इश्क जो यूँ हुआ..
हरगिज़ रज़ा... मेरी न थी...
मगर अब जो ये हुआ...
क्या इल्तजा.. तेरी न थी..
तेरे भी हिस्से थी तनहाइयाँ.
ये फकत सजा... मेरी न थी...


आलोक मेहता...

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और संवेदनशील रचना

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  2. बहुत ही खुबसूरत पंक्तिया...

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  3. @ Sanjay Bhaskar ji...

    बेहद शुक्रिया संजय भास्कर जी...

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  4. @ sushma 'आहुति' ji...


    आभार स्वीकार करे सुषमा जी...

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