गुरुवार, 25 अगस्त 2011

तो... दरमियान फासला न इतना ज्यादा होता...


क्या चाहता हूँ तुझसे.. गर... ज़रा भी मुझे अंदाजा होता...
तो सच कहता हूँ... दरमियान फासला न इतना ज्यादा होता...

आलोक मेहता...

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छी... जितने ही कम शब्द उतनी ही गहराई....

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  2. बहुत सोचा फिर ये जाना मैंने
    तुझसे रिश्ता बस यूँ ही बनाया था शायद

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  3. हो जाते हैं कुछ रिश्ते बनकर बेमायने भी...
    कि हर राह को मंजिल मिले... जरुरी तो नहीं...


    shukriya shephali ji... :) aur acchi panktiya.... pasand aayi...

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