मंगलवार, 13 सितंबर 2011

अभी तो मंजिले बेहिसाब हैं....

जिसे तुम मंजिल कहते हो...
वो तो सिर्फ एक पडाव हैं....
कई हैं सफ़र फेरहिस्त में...
अभी तो मंजिले बेहिसाब हैं....

आलोक मेहता...

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! आप हमेसा ही बहुत ही उम्दा लिखते है....

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  2. सही कहा अलोक जी
    अभी बहुत मंजिलें हैं

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  3. @ Sushma 'Aahuti' ji...


    Behad Shukriya Sushma ji...


    @ Shephali ji...

    Shukriya Shephali ji...

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  4. निराला अंदाज है....अलोक जी आनंद आया पढ़कर

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  5. Sakhi ji behad shukriya.. ummeed hain ki aakhiri baar ana nahi hua hoga aapka.. :)

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