रविवार, 18 सितंबर 2011

कि.. जब साथ हो कोई... और 'साथ' न हो..

दिल में एहसास.. जेहन में जज़्बात न हो...
लब खुले.. मगर.. कहने को कोई बात न हो...
किस तरह वो वक़त-ऐ-वस्ल गुजरे.. ऐ रब...
कि.. जब साथ हो कोई... और 'साथ' न हो...


आलोक मेहता....

7 टिप्‍पणियां: